Wednesday, 19 August 2009

अचानक बदल जाएगा मौसम

दुनिया भर के मौसम में अचानक बदलाव आएगा लेकिन ये अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग तरीके से अपना प्रभाव दिखलाएगा। ये चेतावनी हम नहीं बल्कि वो वैज्ञानिक दे रहे हैं जो पिछले सौ साल के मौसम में आए बदलाव का वैज्ञानिक पद्धति से अध्यन कर रहे हैं। उन्होने पिछले कई साल में कई इलाकों के तापमान में आए परिवर्तन का भी गहन अध्यन किया है। इसके आधार पर उन्होने उस अनुमान को ठुकरा दिया है जिसमें मौसम में धीरे-धीरे बदलाव आने की बात कही गई थी।

वैज्ञानिकों ने इसके लिए अमेरिका के अलास्का और दक्षिण अफ्रीका के कुछ इलाकों के मौसम में तेजी से आए बदलाव का उदाहरण दिया है। दक्षिण अफ्रीका के कुछ इलाकों में तो 1960 में इतनी तेजी से मौसम में बदलाव आया कि वहां की उपजाऊ ज़मीन रेगिस्तान में तब्दील हो गई। अभी के ताज़ा उदाहरण में नार्वे और आयरलैंड को भी शामिल किया गया है जहां पर बहुत तेजी से मौसम में बदलाव आ रहा है।

वैज्ञानिकों ने यूरोप, उत्तरी अमेरिका, आस्ट्रेलिया, रूस, अफ्रीका, खाड़ी देशों, बांग्लादेश और भारत के कई इलाकों को चिन्हित किया है जहां के मौसम में तेजी से बदलाव आ सकता है। और अगर हम अपने भारत की बात करें तो कई इलाकों इसका आंशिक असर भी दिखने लगा है। शोध के मुताबिक बारिश में सामान्य से दस प्रतिशत की गिरावट सूखा आने के संकेत दे सकते हैं। मौसम में आने वाले ये बदलाव दस से बीस साल तक जारी रह सकता है। वैज्ञानिकों ने इस बदलाव के लिए ग्लोबल वार्मिंग के अलावा समुद्री हवाओं के रुख में आ रहे बदलाव को बड़ी वजह बताया है।

समुद्री हवाओं के तेजी और रुख में ये बदलाव समुद्र के किसी छोर में एक हल्के से परिवर्तन से हो सकता है। वैज्ञानिकों ने ऐतिहासिक शीत युग के लिए भी इसी हवा को जिम्मेदार ठहराया है। समुद्री हवाओं में आने वाला ये बदलाव सतही हवाओं में भी परिवर्तन ला सकता है जिससे मौसम में बदलाव आना स्वाभाविक ही होगा। लेकिन वैज्ञानिकों के इस चेतावनी को हमें सकारात्मक तरीके से लेना चाहिए ताकि हम इस बदलाव को आने से पहले ही उसे रोक दें...क्यों कि अगर ऐसा होता है तो पिछली घटनाओं की तरह ही करोड़ों लोग प्रभावित होंगे...इसमें से लाखों की मौत हो सकती है और लाखों लोगों को विस्थापित होना पड़ सकता है।

Tuesday, 18 August 2009

एलियंस से संवाद

कई वैज्ञानिकों का ये दावा है कि एलियंस तरंगों की भाषा समझते हैं... और उनकी इसी समझ ने उन्हें तरंगों का पैग़ाम भेजने के लिए उत्साहित किया...नासा ने मशहूर बैंड बीटल्स का गीत आकाशगंगा में भेज दिया है। उद्देश्य ये है कि शायद हमारे सौरमंडल के बाहर कोई सुन ले और प्यार का ये तराना उसको पसंद आ जाये। ये गीत पोलर स्टार यानि ध्रुव तारे की तरफ भेजा गया। जहां उसे पंहुचने में 431 प्रकाश वर्ष लगेंगे।
4 फरवरी 1968 को बीटल्स ने अपना मशहूर गीत एक्रोस द यूनीवर्स को रिकार्ड किया। इसने दुनिया भर में धूम मचा दी। चालीस साल बाद इसी दिन नासा ने इस गीत को यूनिवर्स में भेज दिया....। इसकी गति करीब 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकेंड होगी....। लेकिन इस गति से चलते हुए भी इसको 431 वर्ष लग जाएंगे....। यानि अगर ये मान भी लिया जाए कि ध्रुव तारे पर अगर कोई इस गीत को सुनेगा भी....तब तक धरती पर करीब 6 पीढ़ियां गुजर जाएंगी और अगर कोई सुनकर जवाब भी देगा....तो जवाब आने में इसका दोगुना यानि करीब 900 साल लग जाएंगे....। तो यह सबकुछ प्रकाश गति पर चलेगा...। जाहिर है इतने लंबे समय में कोई भी एलियन धरती पर जिंदा पहुंच सके....इसकी गुंजाईश बहुत कम है। लेकिन इन सबसे परे नासा फिलहाल इसे बड़ी उपलब्धि मानकर चल रहा है। पहले वो तरंगें एस्ट्रोनॉट्स के लिये भेजा करते थे। अब इसका उपयोग एलियंस के लिए भी किया गया है....तो ऐसे में अपनी धुन का उपयोग होने पर बीटल्स ग्रुप के पॉल मैकार्टनी भी इसे बडी उपलब्धि मान रहे हैं।

Sunday, 16 August 2009

एलियंस का रहस्य

एलियंस की मौजूदगी कहां कहां हो सकती है...ये जानकारी हासिल करने के लिए दुनिया के तमाम वैज्ञानिक जुटे रहे हैं ये कहानी तब से शुरू हुई जब पहला इंसानी कदम ने चांद को छुआ
दुनिया में पहली बार चांद पर कदम रखने वाले अमेरिकी नागरिक नील आर्मस्ट्रांग ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि चांद पर बाकायदा एलियन की कॉलोनी है ...उन्होंने यह भी कहा था कि एलियंस ने उन्हें इशारों में लौटने का संकेत भी किया था ...नील ने ये भी कहा कि मैं उनके बारे में ज्यादा बात कर दुनिया में दहशत नहीं फैलाना चाहता..लेकिन इतना जरुर था कि उनके शिप हमारे शिप से आकार में काफी बड़े थे। उनकी टेक्नोलॉजी हमसे ज्यादा विकसित लगी।

1969 से लेकर 1972 तक अमेरिका के छह अपोलो मिशन चांद पर गए। बताया जाता है कि अंतरिक्ष यात्री जब चांद पर पहुंचे....तो सबसे पहले उनका वास्ता..वहां पहले से बसे दूसरे ग्रह के जीवों से यानि एलियंस से पड़ा, जिन्होंने अमेरिकियों को चांद छोड़कर जाने की चेतावनी दी...। ये खबर रुसी अखबार प्रावदा ने रुस के एक टीवी न्यूज़ चैनल पर एक डोक्यूमैंट्री के हवाले से प्रसारित भी की। प्रावादा ने शक जताया कि जो भी चांद पर पहुंचा उन सभी का एलियंस से पाला पड़ा लेकिन नासा ने पुरी दुनिया से लगातार ये बात छुपाए रखी। जबकि नासा का कहना है कि अपोलो मिशन से जुड़े कई द्स्तावेज, तस्वीरें और फुटेज खो गई है जबकि सूत्र कहते हैं कि तस्वीरें खोने की बात महज सी आई ए का एक बहाना है। प्रावादा के मुताबिक अमेरिकी अंतरिक्षयात्रियों ने अपनी ओर से मैसेज सेंटर को जो मैसेज भेजे थे उनमें यू एफ ओ यानि अन आईडेंटिफाईड फ्लाईंग ऑब्जेक्ट्स देखे जाने और चांद पर कुछ उजड़ी हुई बस्तियां देखे जाने की बात है लेकिन इन कम्यूनिकेशन डॉक्यूमेंट्स को गायब कर दिया गया .

ध्यान देने की बात है कि 1972 के बाद कोई भी व्यक्ति चांद पर नहीं गया ...तो सवाल ये उठता है कि नित नए खोज करने वाले अमेरिकी वैज्ञानिकों सहित नासा ने आखिर चांद पर दूसरे लोगों को भेजना क्यों बंद कर दिया है ... 1972 से लेकर 2008 तक ...नासा ने चांद पर किसी को क्यों नहीं भेजा ...तो क्या इस बात से जाहिर नहीं होता कि हो न हो ...अमेरिकी वैज्ञानिकों ने चांद पर जो कुछ देखा उसे दुनिया से छुपाने की कोशिश कर रहे हों या फिर ऐसा तो नहीं कि एलियंस से निपटने के लिए नासा नई तैयारियों में जुटा है .. जाहिर सी बात ये भी है कि इस सच को छुपाने में अमेरिका कहीं न कहीं अपने हित की भी सोच रहा है ...पर अहम सवाल अब भी वहीं रह जाता है कि आखिर अमेरिका का इसमें कौन सा हित छिपा है ...

हाउस वाइफ को मिलेगा 6 हज़ार रुपये महीना

हाउस वाइफ की आमदनी 6 हज़ार रुपए प्रति महीना कर दी गई है...ये फ़ैसला तीस हजारी कोर्ट ने किया है...इसके लिए उसने सुप्रीम कोर्ट के 'लता वाधवा बनाम स्टेट ऑफ बिहार' मामले के फ़ैसले को आधार बनाया है...इसके लिए महिला की उम्र सीम 34-59 साल रखी गई है.. तीस हज़ारी कोर्ट ने ये फ़ैसला 1989 में एक सड़क दुर्घटना में मारी गई एक महिला को मुआवज़ा देने के लिए सुनाया...कोर्ट ने इंश्योरेंस कंपनी को 6 हज़ार रुपए प्रति माह के हिसाब से मृतक के परिजनों को क़रीब साढ़े 7 लाख का भुगतान करने का निर्देश दिया है...

इस ख़बर की शुरुआती पंक्तियों को पढ़ते वक्त मैने सोचा कि लगता है हमारे वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने ये सरकार को ये नया प्रावधान सुझाया है...फिर मुझे लगा कि इस ख़बर से मुझे खुश होना चाहिए की दुखी...क्यों कि मुझे इतना तो यकीन था कि सरकार हाउस वाइफ को 6 हज़ार रुपए महीना तो देने से रही...हां ये जरूर हो सकता है कि सरकार इसी बहाने उनपर इन्कम टैक्स देने का दबाव बना दे..और फिर उनसे मिले राजस्व को नेताओं की मौज मस्ती पर उड़ा दे...खैर मेरी सांस में सांस तब आई जब देखा कि ये मामला महज मुआवजे का है और कोर्ट ने एक अनुमान के आधार पर हाउस वाइफ की ये आमदनी बताई...हां उसने इतना जरूर किया सुप्रीम कोर्ट के 3 हज़ार रुपए प्रति महीने की आमदनी के फ़ैसले को बदलते हुए 6 हज़ार प्रति महीने कर दिया...चलिए कम से कम न्यायपालिका को तो महंगाई का अहसास हुआ

Saturday, 15 August 2009

गंगा मैय्या की विदाई

भारत की मोक्षदायिनी गंगा नदी सूखने की कगार पर है। वैज्ञानिकों के भविष्यवाणी को अगर सही माने तो जीवन दायिनी गंगा अब कुछ ही वर्षों की मेहमान है। और जब ऐसी स्थिति आएगी तो हमें अपने पाप धोने के लिए गंगा का पानी नसीब नहीं होगा। क्या गंगा मैया इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह जाएगी...ये जानने के लिए पहले गंगा नदी के उदगम के बारे में जानना होगा

हिमालय के गंगोत्री ग्लेशियर से निकल कर करीब 200 किलोमीटर का सफर तय करके गंगा नदी गोमुख होते हुए हरिद्वार पहुंचती है। इससे पहले गंगा नदी में 6 नदियों का विलय होता है...अलकनंदा नदी विष्णुप्रयाग में धौलीगंगा से मिलती है...उसके बाद थोड़ा आगे चलकर नंदप्रयाग में नंदाकिनी नदी का विलय होता है...कर्णप्रयाग में पिंडर नदी मिलती है...रुद्रप्रयाग में मंदाकिनी नदी से मिलन होता है... आखिर में देव प्रयाग में भागिरथी से मिलकर गंगा नदी अपने वास्तविक रूप में आती है और शिवालिक पहाड़ी से होती हुई हरिद्वार में अवतरित होती है।

इसके बाद ये नदी क़रीब 2,510 किलोमीटर का लंबा सफर तय करती हुई बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। इस दौरान ये मुरादाबाद, रामपुर, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, और राजशाही जैसे शहरों से होकर गुजरती है। इसमें से हरिद्वार, इलाहाबाद और वाराणसी हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताओं से काफी जुड़े हुए हैं। ये गंगा नदी भारत की लगभग आधी आबादी के लिए जीवन दायिनी बनी हुई है। कहीं इसके पानी का इस्तेमाल पीने के लिए हो रहा है तो कहीं इससे निकाली गई नहरों से सिंचाई की जा रही है। और अगर धार्मिक मान्यताओं की बात करें तो हिन्दुओं ने इसे माता का दर्जा दिया है और वे इसकी पूजा करते हैं। हिन्दुओं के पौराणिक ग्रन्थों में भी इस नदी का जिक्र मिलता है।

अब वही गंगा मैया इतिहास के पन्नों में सिमटने की तैयारी कर रही है और इसकी वजह है हमलोगों के पाप जो ग्लोबल वार्मिंग बनकर पल पल इसे आखिरी मुकाम की ओर ढ़केल रहे हैं। जी हां वैज्ञानिकों ने ग्लोबल वार्मिंग को ही गंगा नदी के सूखने की वजह बताई है। उनके मुताबिक गंगा नदी जिस गंगोत्री ग्लेशियर से निकलती है वो तेजी से पिघल रहा है। गंगा नदी का क़रीब 70 फीसदी पानी इस ग्लेशियर से आता है और ये हर साल 50 यार्ड की रफ़्तार से पिघल रहा है। जो कि दस साल पहले किए गए अनु्मान से दोगुना है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर ग्लेशियर के पिघलने की रफ़्तार इस तरह से जारी रही तो 2030 तक ये ग्लेशियर पूरी तरह से पिघल जाएगा और सूखने लगेगी गंगा नदी। वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक उस स्थिति में गंगा नदी मौसमी नदी बनकर रह जाएगी...जो केवल बरसात के मौसम में ही नज़र आएगी। अगर ऐसा कुछ होता है तो जरा सोचिए उस पूरी आबादी का क्या होगा जो इस जीवन दायिनी और मोक्ष दायिनी के सहारे जी रहे हैं साथ ही उन करोड़ों लोगों का क्या होगा जिनकी आस्था इस नदी से जुड़ी हुई है....इसलिए यही सही वक्त है कि हम सचेत हो जाएं और गंगा नदी को बचाने का संकल्प लें...

Friday, 14 August 2009

सिकुड़ता ग्रह


आईए आज हम आपको बताते हैं कि बुध ग्रह पर क्या हलचलें चल रही है। क्यों इस ग्रह को लेकर वैज्ञानिकों के बीच गहमा गहमी बढ़ गई है। क्या ये ग्रह छोटा हो रहा है...क्या ये ग्रह धीरे-धीरे ख़त्म हो जाएगा...और इससे हमारी धरती पर क्या प्रभाव पड़ सकता है

बुध ग्रह...सूर्य के सबसे नजदीक का ग्रह...इस ग्रह को सूर्य का एक पूरा चक्कर लगाने में केवल 88 दिन ही लगते हैं। इस ग्रह का आकार पृथ्वी का लगभग एक तिहाई है लेकिन ये चंद्रमा से थोडा़ बड़ा है। बुध ग्रह चुंकि सूर्य के काफी नजदीक है इसलिए इसके सतह पर तापमान काफी ज़्यादा रहता है लेकिन इसका गुरुत्वाकर्षण शक्ति काफी कम होने के कारण इसके दिन और रात के तापमान में ही करीब 600 डिग्री का फर्क रहता है। मार्च 1975 से पहले तक ये ग्रह एक अबूझ पहेली बना हुआ था...पर मैरीनर नाम के एक अंतरिक्ष यान ने इस ग्रह के पास पहुंचकर उसके बारे में काफी जानकारियां वैज्ञानिकों को मुहैया कराई.. जिससे ग्रह के बारे में काफी भ्रांतियां ख़त्म हो गई। लेकिन तब भी उस अंतरिक्ष यान ने बुध ग्रह के केवल 45 फीसदी हिस्से का मुआयना किया था।


अब जो हम आपको बताने जा रहे हैं उसे सुनकर आपको काफी हैरानी होगी...दरअसल नासा के मैसेंजर अंतरिक्ष यान ने इसी साल जनवरी में बुध ग्रह की कई तस्वीरें और जानकारियां धरती पर भेजी है...जिसके विश्लेषण के बाद वैज्ञानिकों को काफी हैरतअंगेज परिणाम मिले हैं। उसके मुताबिक ग्रह पर ज्वालामुखी विस्फोटों का काफी लंबा इतिहास रहा है...जिसके कारण ग्रह पर काफी लंबी चौड़ी खाईयां बन गई है ये खाईयां 4-5 फीट से लेकिर 1000 किलोमीटर की परिधि वाली हैं। ग्रह पर सब ओर लावा ही लावा छाया हुआ है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इस ग्रह से आए दिन उल्का पिंड टकराते रहते हैं जिससे भी ग्रह की ये हालत हुई है। वैज्ञानिकों को ये जानकर भी काफी हैरानी हुई है कि ये पूरा ग्रह अब धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है...इस ग्रह के आकार में वैज्ञानिकों की सोच से ज़्यादा सिकुड़न आई है। ये ग्रह लगभग डेढ़ किलोमीटर छोटा हो गया है...और ऐसा इस ग्रह के कच्चे लोहे के जमने से हुआ है। हालांकि मैसेंजर ने इस ग्रह का लगभग 75 प्रतिशत हिस्से का ही मुआयना किया है लेकिन इस दौरान जो सबसे चौकाने वाला तथ्य सामने आया है वो है ग्रह के वातावरण में मिले सिलीकन, सोडियम और पानी के कण...वैज्ञानिकों के मुताबिक ग्रह में पानी के कण मिलना अपने आप में काफी चौंकाने वाली बात....वैसे वैज्ञानिकों के पास इसके बारे में काफी तर्क हैं। और जहां तक इस ग्रह पर होने वाली हलचलों का धरती पर प्रभाव पड़ने का सवाल है तो...वैज्ञानिकों के मुताबिक धरती पर इसका कोई असर नहीं होगा।...अब इंतजार है वर्ष 2011 का जब मैसेंजर अपनी यात्रा के दौरान एक बार फिर बुध ग्रह के पास पहुंचेगा और फिर उस ग्रह के कई रहस्यों पर से पर्दा उठेगा....

Thursday, 13 August 2009

छोटा हो रहा है दिमाग

किसी ने शायद ठीक ही कहा है..."खाली दिमाग शैतान का घर"...लेकिन अगर हमने समय रहते ध्यान नहीं दिया तो ये घर छोटा हो सकता है...जी हां वैज्ञानिकों का यही कहना है कि अगर हमने अपने दिमाग से काम नहीं लिया और उसे खाली छोड़ दिया तो वो धीरे-धीरे छोटा हो जाएगा।
आईए अब हम आपको बताते हैं कि ये कैसे संभव होगा....दरअसल हम जो फैसले लेते हैं उसमें दिमाग के दो हिस्सों की अहम भूमिका होती है...ये हमपर निर्भर करता है कि हम दिमाग के किस हिस्से से ज़्यादा काम लेते हैं...इसके लिए हमें दिमाग के काम करने के तरीके को समझना होगा...दिमाग के जो हिस्से फैसले लेने का काम करते हैं उसमें से एक होता है सब-कॉर्टिकल ब्रेन और दूसरा हिस्सा है उसको चारो तरफ घेरे हुए आउटर कॉर्टेक्स। सब-कॉर्टिकल ब्रेन से हम जल्दबाजी वाले फैसले लेते हैं जैसे किसी जानवर के हमला करने की स्थिति में..किसी गर्म चीज के छू जाने पर...या फिर ऐसी कुछ स्थिति में जब तुरत फैसला लेना जरूरी होता है...लेकिन ऐसी स्थिति में कई बार दिमाग का ये हिस्सा ग़लत फ़ैसले भी ले लेता है। सब-कॉर्टिकल ब्रेन के बाहरी भाग में मौजूद आउटर कॉर्टेक्स से कोई भी फ़ैसला काफी सोच समझ कर और कई जानकारी जुटा कर लिया जाता है लेकिन इससे फैसला लेने में थोड़ा वक्त चाहिए होता है। कोई भी नीतिगत और महत्वपूर्ण फैसला लेना दिमाग के इसी हिस्से का काम होता है। दिमाग का ये हिस्सा मानव जाति के विकास के शुरूआती दिनों में नहीं था...और धीरे धीरे काफी समय बीतने के बाद दिमाग के इस हिस्से का विकास हुआ....अब वैज्ञानिकों ने जो ताज़ा शोध किया है उसके मुताबिक हमारी जीवन शैली में जिस तरह से बदलाव आ रहा है उससे दिमाग के एक हिस्से से हम बहुत कम काम ले रहे हैं...अगर ऐसी स्थिति लगातार बनी रही तो हो सकता है कि वो हिस्सा धीरे-धीरे छोटा होने लगे।

आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के एक दल ने अपने ताज़ा शोध में कई चौंकाने वाले आंकड़े जुटाए हैं जिसके मुताबिक कई बुजुर्गों का दिमाग उन्होने छोटा पाया। जांच करने पर पाया गया कि उन बुजुर्गों ने दिमाग लगाने वाले ज़्यादा काम नहीं किए थे। इस आधार पर वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अगर दिमाग को छोटा होने से बचाना है तो एक आम आदमी को भी ज़्यादा से ज़्यादा दिमाग का इस्तेमाल करते रहना चाहिए। इसके लिए उन्हे दिमागी कसरत, पहेलियों का खेल, नई भाषा सीखने और अन्य दिमागी काम में अपने आप को व्यस्त रखना चाहिए