Sunday, 16 August 2009

हाउस वाइफ को मिलेगा 6 हज़ार रुपये महीना

हाउस वाइफ की आमदनी 6 हज़ार रुपए प्रति महीना कर दी गई है...ये फ़ैसला तीस हजारी कोर्ट ने किया है...इसके लिए उसने सुप्रीम कोर्ट के 'लता वाधवा बनाम स्टेट ऑफ बिहार' मामले के फ़ैसले को आधार बनाया है...इसके लिए महिला की उम्र सीम 34-59 साल रखी गई है.. तीस हज़ारी कोर्ट ने ये फ़ैसला 1989 में एक सड़क दुर्घटना में मारी गई एक महिला को मुआवज़ा देने के लिए सुनाया...कोर्ट ने इंश्योरेंस कंपनी को 6 हज़ार रुपए प्रति माह के हिसाब से मृतक के परिजनों को क़रीब साढ़े 7 लाख का भुगतान करने का निर्देश दिया है...

इस ख़बर की शुरुआती पंक्तियों को पढ़ते वक्त मैने सोचा कि लगता है हमारे वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने ये सरकार को ये नया प्रावधान सुझाया है...फिर मुझे लगा कि इस ख़बर से मुझे खुश होना चाहिए की दुखी...क्यों कि मुझे इतना तो यकीन था कि सरकार हाउस वाइफ को 6 हज़ार रुपए महीना तो देने से रही...हां ये जरूर हो सकता है कि सरकार इसी बहाने उनपर इन्कम टैक्स देने का दबाव बना दे..और फिर उनसे मिले राजस्व को नेताओं की मौज मस्ती पर उड़ा दे...खैर मेरी सांस में सांस तब आई जब देखा कि ये मामला महज मुआवजे का है और कोर्ट ने एक अनुमान के आधार पर हाउस वाइफ की ये आमदनी बताई...हां उसने इतना जरूर किया सुप्रीम कोर्ट के 3 हज़ार रुपए प्रति महीने की आमदनी के फ़ैसले को बदलते हुए 6 हज़ार प्रति महीने कर दिया...चलिए कम से कम न्यायपालिका को तो महंगाई का अहसास हुआ

Saturday, 15 August 2009

गंगा मैय्या की विदाई

भारत की मोक्षदायिनी गंगा नदी सूखने की कगार पर है। वैज्ञानिकों के भविष्यवाणी को अगर सही माने तो जीवन दायिनी गंगा अब कुछ ही वर्षों की मेहमान है। और जब ऐसी स्थिति आएगी तो हमें अपने पाप धोने के लिए गंगा का पानी नसीब नहीं होगा। क्या गंगा मैया इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह जाएगी...ये जानने के लिए पहले गंगा नदी के उदगम के बारे में जानना होगा

हिमालय के गंगोत्री ग्लेशियर से निकल कर करीब 200 किलोमीटर का सफर तय करके गंगा नदी गोमुख होते हुए हरिद्वार पहुंचती है। इससे पहले गंगा नदी में 6 नदियों का विलय होता है...अलकनंदा नदी विष्णुप्रयाग में धौलीगंगा से मिलती है...उसके बाद थोड़ा आगे चलकर नंदप्रयाग में नंदाकिनी नदी का विलय होता है...कर्णप्रयाग में पिंडर नदी मिलती है...रुद्रप्रयाग में मंदाकिनी नदी से मिलन होता है... आखिर में देव प्रयाग में भागिरथी से मिलकर गंगा नदी अपने वास्तविक रूप में आती है और शिवालिक पहाड़ी से होती हुई हरिद्वार में अवतरित होती है।

इसके बाद ये नदी क़रीब 2,510 किलोमीटर का लंबा सफर तय करती हुई बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। इस दौरान ये मुरादाबाद, रामपुर, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, और राजशाही जैसे शहरों से होकर गुजरती है। इसमें से हरिद्वार, इलाहाबाद और वाराणसी हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताओं से काफी जुड़े हुए हैं। ये गंगा नदी भारत की लगभग आधी आबादी के लिए जीवन दायिनी बनी हुई है। कहीं इसके पानी का इस्तेमाल पीने के लिए हो रहा है तो कहीं इससे निकाली गई नहरों से सिंचाई की जा रही है। और अगर धार्मिक मान्यताओं की बात करें तो हिन्दुओं ने इसे माता का दर्जा दिया है और वे इसकी पूजा करते हैं। हिन्दुओं के पौराणिक ग्रन्थों में भी इस नदी का जिक्र मिलता है।

अब वही गंगा मैया इतिहास के पन्नों में सिमटने की तैयारी कर रही है और इसकी वजह है हमलोगों के पाप जो ग्लोबल वार्मिंग बनकर पल पल इसे आखिरी मुकाम की ओर ढ़केल रहे हैं। जी हां वैज्ञानिकों ने ग्लोबल वार्मिंग को ही गंगा नदी के सूखने की वजह बताई है। उनके मुताबिक गंगा नदी जिस गंगोत्री ग्लेशियर से निकलती है वो तेजी से पिघल रहा है। गंगा नदी का क़रीब 70 फीसदी पानी इस ग्लेशियर से आता है और ये हर साल 50 यार्ड की रफ़्तार से पिघल रहा है। जो कि दस साल पहले किए गए अनु्मान से दोगुना है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर ग्लेशियर के पिघलने की रफ़्तार इस तरह से जारी रही तो 2030 तक ये ग्लेशियर पूरी तरह से पिघल जाएगा और सूखने लगेगी गंगा नदी। वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक उस स्थिति में गंगा नदी मौसमी नदी बनकर रह जाएगी...जो केवल बरसात के मौसम में ही नज़र आएगी। अगर ऐसा कुछ होता है तो जरा सोचिए उस पूरी आबादी का क्या होगा जो इस जीवन दायिनी और मोक्ष दायिनी के सहारे जी रहे हैं साथ ही उन करोड़ों लोगों का क्या होगा जिनकी आस्था इस नदी से जुड़ी हुई है....इसलिए यही सही वक्त है कि हम सचेत हो जाएं और गंगा नदी को बचाने का संकल्प लें...

Friday, 14 August 2009

सिकुड़ता ग्रह


आईए आज हम आपको बताते हैं कि बुध ग्रह पर क्या हलचलें चल रही है। क्यों इस ग्रह को लेकर वैज्ञानिकों के बीच गहमा गहमी बढ़ गई है। क्या ये ग्रह छोटा हो रहा है...क्या ये ग्रह धीरे-धीरे ख़त्म हो जाएगा...और इससे हमारी धरती पर क्या प्रभाव पड़ सकता है

बुध ग्रह...सूर्य के सबसे नजदीक का ग्रह...इस ग्रह को सूर्य का एक पूरा चक्कर लगाने में केवल 88 दिन ही लगते हैं। इस ग्रह का आकार पृथ्वी का लगभग एक तिहाई है लेकिन ये चंद्रमा से थोडा़ बड़ा है। बुध ग्रह चुंकि सूर्य के काफी नजदीक है इसलिए इसके सतह पर तापमान काफी ज़्यादा रहता है लेकिन इसका गुरुत्वाकर्षण शक्ति काफी कम होने के कारण इसके दिन और रात के तापमान में ही करीब 600 डिग्री का फर्क रहता है। मार्च 1975 से पहले तक ये ग्रह एक अबूझ पहेली बना हुआ था...पर मैरीनर नाम के एक अंतरिक्ष यान ने इस ग्रह के पास पहुंचकर उसके बारे में काफी जानकारियां वैज्ञानिकों को मुहैया कराई.. जिससे ग्रह के बारे में काफी भ्रांतियां ख़त्म हो गई। लेकिन तब भी उस अंतरिक्ष यान ने बुध ग्रह के केवल 45 फीसदी हिस्से का मुआयना किया था।


अब जो हम आपको बताने जा रहे हैं उसे सुनकर आपको काफी हैरानी होगी...दरअसल नासा के मैसेंजर अंतरिक्ष यान ने इसी साल जनवरी में बुध ग्रह की कई तस्वीरें और जानकारियां धरती पर भेजी है...जिसके विश्लेषण के बाद वैज्ञानिकों को काफी हैरतअंगेज परिणाम मिले हैं। उसके मुताबिक ग्रह पर ज्वालामुखी विस्फोटों का काफी लंबा इतिहास रहा है...जिसके कारण ग्रह पर काफी लंबी चौड़ी खाईयां बन गई है ये खाईयां 4-5 फीट से लेकिर 1000 किलोमीटर की परिधि वाली हैं। ग्रह पर सब ओर लावा ही लावा छाया हुआ है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इस ग्रह से आए दिन उल्का पिंड टकराते रहते हैं जिससे भी ग्रह की ये हालत हुई है। वैज्ञानिकों को ये जानकर भी काफी हैरानी हुई है कि ये पूरा ग्रह अब धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है...इस ग्रह के आकार में वैज्ञानिकों की सोच से ज़्यादा सिकुड़न आई है। ये ग्रह लगभग डेढ़ किलोमीटर छोटा हो गया है...और ऐसा इस ग्रह के कच्चे लोहे के जमने से हुआ है। हालांकि मैसेंजर ने इस ग्रह का लगभग 75 प्रतिशत हिस्से का ही मुआयना किया है लेकिन इस दौरान जो सबसे चौकाने वाला तथ्य सामने आया है वो है ग्रह के वातावरण में मिले सिलीकन, सोडियम और पानी के कण...वैज्ञानिकों के मुताबिक ग्रह में पानी के कण मिलना अपने आप में काफी चौंकाने वाली बात....वैसे वैज्ञानिकों के पास इसके बारे में काफी तर्क हैं। और जहां तक इस ग्रह पर होने वाली हलचलों का धरती पर प्रभाव पड़ने का सवाल है तो...वैज्ञानिकों के मुताबिक धरती पर इसका कोई असर नहीं होगा।...अब इंतजार है वर्ष 2011 का जब मैसेंजर अपनी यात्रा के दौरान एक बार फिर बुध ग्रह के पास पहुंचेगा और फिर उस ग्रह के कई रहस्यों पर से पर्दा उठेगा....

Thursday, 13 August 2009

छोटा हो रहा है दिमाग

किसी ने शायद ठीक ही कहा है..."खाली दिमाग शैतान का घर"...लेकिन अगर हमने समय रहते ध्यान नहीं दिया तो ये घर छोटा हो सकता है...जी हां वैज्ञानिकों का यही कहना है कि अगर हमने अपने दिमाग से काम नहीं लिया और उसे खाली छोड़ दिया तो वो धीरे-धीरे छोटा हो जाएगा।
आईए अब हम आपको बताते हैं कि ये कैसे संभव होगा....दरअसल हम जो फैसले लेते हैं उसमें दिमाग के दो हिस्सों की अहम भूमिका होती है...ये हमपर निर्भर करता है कि हम दिमाग के किस हिस्से से ज़्यादा काम लेते हैं...इसके लिए हमें दिमाग के काम करने के तरीके को समझना होगा...दिमाग के जो हिस्से फैसले लेने का काम करते हैं उसमें से एक होता है सब-कॉर्टिकल ब्रेन और दूसरा हिस्सा है उसको चारो तरफ घेरे हुए आउटर कॉर्टेक्स। सब-कॉर्टिकल ब्रेन से हम जल्दबाजी वाले फैसले लेते हैं जैसे किसी जानवर के हमला करने की स्थिति में..किसी गर्म चीज के छू जाने पर...या फिर ऐसी कुछ स्थिति में जब तुरत फैसला लेना जरूरी होता है...लेकिन ऐसी स्थिति में कई बार दिमाग का ये हिस्सा ग़लत फ़ैसले भी ले लेता है। सब-कॉर्टिकल ब्रेन के बाहरी भाग में मौजूद आउटर कॉर्टेक्स से कोई भी फ़ैसला काफी सोच समझ कर और कई जानकारी जुटा कर लिया जाता है लेकिन इससे फैसला लेने में थोड़ा वक्त चाहिए होता है। कोई भी नीतिगत और महत्वपूर्ण फैसला लेना दिमाग के इसी हिस्से का काम होता है। दिमाग का ये हिस्सा मानव जाति के विकास के शुरूआती दिनों में नहीं था...और धीरे धीरे काफी समय बीतने के बाद दिमाग के इस हिस्से का विकास हुआ....अब वैज्ञानिकों ने जो ताज़ा शोध किया है उसके मुताबिक हमारी जीवन शैली में जिस तरह से बदलाव आ रहा है उससे दिमाग के एक हिस्से से हम बहुत कम काम ले रहे हैं...अगर ऐसी स्थिति लगातार बनी रही तो हो सकता है कि वो हिस्सा धीरे-धीरे छोटा होने लगे।

आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के एक दल ने अपने ताज़ा शोध में कई चौंकाने वाले आंकड़े जुटाए हैं जिसके मुताबिक कई बुजुर्गों का दिमाग उन्होने छोटा पाया। जांच करने पर पाया गया कि उन बुजुर्गों ने दिमाग लगाने वाले ज़्यादा काम नहीं किए थे। इस आधार पर वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अगर दिमाग को छोटा होने से बचाना है तो एक आम आदमी को भी ज़्यादा से ज़्यादा दिमाग का इस्तेमाल करते रहना चाहिए। इसके लिए उन्हे दिमागी कसरत, पहेलियों का खेल, नई भाषा सीखने और अन्य दिमागी काम में अपने आप को व्यस्त रखना चाहिए

Wednesday, 12 August 2009

सच का सामना

आजकल एक निजी चैनल पर चल रहा एक कार्यक्रम "सच का सामना" काफी चर्चा में है..लेकिन कई बार किसी प्रतियोगी के सच्चे बात को मशीन झूठा बता देता है...आज मैं आपको बताता हूं इसके पीछे की सच्चाई, कि क्यों कोई शख़्स सच बोलने के बावजूद झूठा बन जाता है..आप ये भी जानना चाहेंगे कि आखिर वो क्या वजह है जिससे हम अनजाने में भी झूठ बोल जाते हैं...यहां तक की कई बार हमें ही पता नहीं होता है कि हम जो बोल रहे हैं दरअसल वो झूठ है

इन सारी उलझनों का जवाब है आपका दिमाग...जी हां आपने बिलकुल ठीक पढ़ा...झूठ बोलकर आपको धोखा कोई और नहीं बल्कि आपका दिमाग ही दे रहा है। आईए आपको बताते हैं कि ये कैसे मुमकिन होता है...दरअसल हमारा दिमाग कंप्यूटर की तरह काम नहीं करता...और किसी भी बात को याद करने का उसका तरीका कंप्यूटर से बिलकुल अलग है। वैज्ञानिकों के एक शोध के मुताबिक जब भी हम किसी बात को याद रखने के लिए अपने दिमाग को आदेश देते हैं तो दिमाग उसे अपने हिप्पोकैम्पस नाम के हिस्स में सुरक्षित रख लेता है। और जब उस जानकारी को दोबारा याद करने की कोशिश करते हैं तो वो जानकारी दिमाग से सीधे नहीं निकलता है बल्कि दिमाग उस जानकारी को फिर से लिखता है और इस दौरान वो पूरी जानकारी दिमाग के एक दूसरे हिस्से में सेरिब्रल कॉर्टेक्स में आ जाती है। जिससे ये पूरी जानकारी दिमाग के पुराने हिस्से से बाहर आ जाती है। और अगर हमने उसे बार-बार याद करने की कोशिश नहीं की तो वो पूरी जानकारी फिर से दिमाग के उस सुरक्षित हिस्से में नहीं जा पाती है...जिससे समय समय पर उसमें कुछ और भी जानकारियां जुट जाती है...नतीज़ा होता है कि दिमाग अब पुरानी जानकारियों को नई जानकारियों के साथ आपके सामने पेश करता है...और यहीं से शुरू होता है उसके झूठ बोलने का सिलसिला...

और जब दिमाग की ये ख़ुराफ़ात बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है तो वो एक बीमारी का शक्ल ले लेती है जिसे हम एम्नेशिया कहते हैं....लेकिन साधारण तौर पर एक साधारण आदमी से दिमाग कई बार झूठ बोलता है...और यही वजह है कि आप....कई जगहों...कई लोगों के नाम...कई घटनाओं...और कई अन्य चीजों के बारे में दिमाग का कहा मानकर ग़लत जानकारी दे देते हैं।

मिल गई एक और धरती

पूरे विश्व में जिस तरह से जनसंख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है उससे ये लगने लगा है कि जल्दी ही पूरी जनसंख्या को सभालने के लिए हमारी धरती छोटी पड़ जाएगी...इसी को देखते हुए वैज्ञानिकों ने नई धरती की खोज शुरू कर दी है..और इस खोज में उन्हे काफी हद तक सफलता भी मिली है..तो आईए आपको बताते हैं इस नई धरती के बारे में...इस धरती की खोज को वैज्ञानिक बहुत बड़ी कामयाबी मान रहे हैं। लेकिन अभी उनका शोध बहुत शुरुआती दौर में है। वैज्ञानिकों की शोध को अगर सच माने तो ये नई धरती अपनी धरती से काफी मिलती जुलती है...

वैज्ञानिकों के कई वर्षों की कड़ी मेहनत का नतीज़ा है ये धरती। इस धरती की आयु है एक से डेढ़ करोड़ वर्ष। हालांकि इस धरती की उम्र अपनी धरती से काफी कम है। लेकिन दोनों ही ग्रहों में काफी समानताएं पाई गई हैं। धरती से क़रीब 430 प्रकाश वर्ष दूर मिले इस ग्रह का पता नासा के स्पीट्जर स्पेस टेलिस्कोप से चला है...ये टेलिस्कोप धरती से बाहर अंतरिक्ष में स्थित है और इन्फ्रारेड लाईट की पद्धति पर काम करती है। इसी टेलिस्कोप की सहायता से वैज्ञानिकों ने इस नई धरती के बारे में कई दिलचस्प जानकारियां इकट्ठी की है। हालांकि इससे पहले भी ऐसे कुछ ग्रहों का पता चला था... लेकिन उन ग्रहों में धरती से इतनी समानता नहीं थी। हम आपको जिस नई धरती के बार में बता रह हैं वो भी सूर्य की तरह के ही एक तारे के चारो तरफ धूमती है...साथ ही साथ ये अपने अक्ष पर भी धरती के समान ही धुर्णन करती है। इसके अलावा इस ग्रह की अपने तारे से दूरी भी पृथ्वी और सूर्य की दूरी के बराबर ही है। सबसे चौंकाने वाली जानकारी जो इस ग्रह के बारे में पता चली है वो है इस ग्रह पर पानी पाए जाने की संभावना... क्योंकि पृथ्वी के समान ही वायुमंडल वाले इस ग्रह का बाहरी आवरण बर्फ से ढ़का हुआ है।
पृथ्वी से मिल रही समानताओं ने वैज्ञानिकों को ये सोचने पर भी मजबूर कर दिया है कि क्या इस नई धरती पर भी जीवन है। और अगर यहां जीवन है तो वो किस अवस्था में है। और अगर वो काफी विकसित है तो क्या यहीं से धरती पर उड़न तश्तरियां आती हैं। इन्ही सब संभावनाओं को खंगालने के लिए वैज्ञानिक इस ग्रह पर और शोध करने में जुट गए हैं। लेकिन इन सब के बीच जो सबसे बड़ी अड़चन है...वो है इस नई धरती की पृथ्वी से दूरी....ये दूरी अरबों किलोमीटर होने के कारण...इस ग्रह के आस-पास किसी अंतरिक्ष यान का पहुंचना मौजूदा तकनीक के मुताबिक असंभव सा लग रहा है...

Thursday, 7 May 2009

ज़िंदगी यूं भी....


ज़िंदगी यूं भी बसर होती है
बिन चरागों के सहर होती है

कोई बादल साया परस्त नहीं होता
धूप होती है, क़हर होती है

पानी कहां गया ये किसे मालूम
मेरे खेतों में तो नहर होती है

कोई रंग नहीं आसमां पे तो क्या
ज़िंदगी बेरंग सही मगर होती है

वक्त के हाथों में हर शक्स थमा है
यहां किसको किसकी ख़बर होती है

हुकूकों को वही हासिल किया करते हैं
हालात पे जिनकी नज़र होती है