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Sunday, 23 November 2008

तेल से बढ़ता ज्ञान..

अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत 55 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे पहुंच गई है...फिर भी हम बढ़ी कीमत पर तेल ख़रीद रहे हैं...केन्द्र सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमत का रोना रोकर तेल की कीमत बढ़ा दी थी...पर ऐसी क्या वजह है कि कीमत गिरने के बावजूद हमारी सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है...वो तेल की कीमत कम नहीं करने पर अड़ी हुई है।
जैसा कि आपको पता ही है कि जुलाई में अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत 147 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी॥अगर उस कीमत की तुलना आज से की जाए तो तेल की कीमत में क़रीब 60 फीसदी की गिरावट आई है...मैं ये नहीं कहता कि तेल में की गई बढ़ोत्तरी को पूरी तरह से वापस ले लिया जाए...लेकिन 60 फीसदी के अनुपात में उस बढ़ोत्तरी को कम तो किया जा सकता है...
तेल संकट के समय केन्द्र ने पेट्रोल की दर में प्रति लीटर 5 की बढ़ोत्तरी की थी...अगर उस बढ़ोत्तरी को कम किया जाए तो उपभोक्ताओं को प्रति लीटर तीन रूपए कम देने पड़ेंगे। अगर इस फार्मूले को डीज़ल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों पर भी लागू किया जाए तो बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं। सबसे ज़्यादा फर्क ढ़ुलाई में आ रहे अतिरिक्त खर्चे पर पड़ेगा...जिससे आम जरूरी चीजों की कीमत कम होगी और कुल मिलाकर कह सकते हैं कि इससे महंगाई और महंगाई दर दोनों में गिरावट आ सकती है।
मनमोहन सरकार ने तेल संकट के समय घड़ियाली आंसू बहाकर आम जनता को अपनी मजबूरी सुना दी...पर जब उसी जनता को थोड़ी रियायत देने का समय आया तो उन्हे पेट्रोलियम कंपनी के हितों की परवाह होने लगी। प्रधानमंत्री ने ये ऐलान कर दिया कि जब तक पेट्रोलियम कंपनियों का घाटा खत्म नहीं हो जाता तब तक तेल की कीमतों में कमी करना मुमकिन नहीं है।
उन्हे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की आम आदमी की रसोई में अब केवल ख़ास मौकों पर ही हरी सब्जी का दर्शन हो पात है। इन लोगों की दाल इतनी पतली हो गई है कि उससे पीले पानी का आभास होने लगा है..अब उन्होने पैकेट वाले आटे की बजाए खुला आटा लेना शुरू कर दिया है...वर्षों बाद इस आम आदमी को ये पता चल गया है कि चाय के अलावा उनको दूध की बिलकुल भी जरूरत नहीं है। अगर उनके घर पर कोई मेहमान आ जाए तो उन्हे अपने बेटे का गुल्लक तोड़ना पड़ जाता है। ये आम इंसान पर्व-त्योहार पर अपने लिए नया कपड़ा नहीं ले पा रहा है क्यों कि उसे अब लगने लगा है कि पिछले साल लिया गया उनका कपड़ा अभी बिलकुल नए जैसा है। उसने अपने बच्चों का नाम सरकारी स्कूल में लिखवाने का फ़ैसला कर लिया है क्यों कि उसे लगता है कि प्राईवेट के मुकाबले सरकारी स्कूलों में ज्यादा अच्छी पढ़ाई होती है...अचानक उसे अपनी सेहत का भी ख़्याल आ गया है इसलिए अब वो स्कूटर के बजाए साईकिल से ही ऑफिस जाने लगा है।
शायद ऐसे ही ज्ञान ने एक राजकुमार को गौतम बुद्ध बना दिया था...पर आज के इस दौर में आम इंसान इस ज्ञान को पाकर खुद को अपने परिवार वालों को बुद्धु बना रहा है। भले ही इस ज्ञान के पीछे की वजह लगातार बढ़ रही महंगाई हो...
पर केन्द्र सरकार को इससे क्या मतलब...उसकी निगाहें तो बस आने वाले पर टिकी हुई है और अगर इससे फुर्सत मिल जाए तो उसे इस बात की फिक्र ज़्यादा रहती है कि कैसे बराक ओबामा की कृपा दृष्टि उन पर पड़ जाए

Thursday, 6 November 2008

साध्वी के आड़ में साजिश...?

मालेगांव ब्लास्ट मामले में जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती जा रही है..इसकी गुत्थियां और भी उलझती जा रही है...आरोपित साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर पर तरह-तरह से जुर्म कबूलने का दबाव डाला जा रहा है। हर दूसरे दिन उसे एक नई तकनीकी जांच के लिए तैयार किया जाता है। अब तो साध्वी के बेगुनाह होने की आवाज भी उठने लगी है।
जाहिर सी बात है कि अभी तक महाराष्ट्र के आतंकवादी निरोधक दस्ते के हाथ ऐसा कोई पुख्ता सबूत हाथ नहीं लगा है जिसके आधार पर वो साध्वी को दोषी ठहरा सके...इस बीच साध्वी ने ये मान लिया है कि उसने अपने मोटरसाईकिल बम धमाके के एक आरोपित को दिया था...पर उसने ये भी कहा कि उसे मोटरसाईकिल के इस्तेमाल के बारे में पता नहीं था। अगर साध्वी की बातों में सच्चाई है तो क्या अपने किसी परिचित को अपनी
मोटरसाईकिल देना इतना बड़ा अपराध है ?
उधर इन सब ख़बरों के बीच भारतीय जनशक्ति पार्टी तो पहले से ही प्रज्ञा को अपना तुरूप का पत्ता बनाने में जुटी हुई है...हो सकता है कि उनका ये मानना है कि अगर एक साध्वी मध्यप्रदेश में बीजेपी की सरकार बनवा सकती है तो दूसरी साध्वी बीजेएसपी की सरकार क्यों नहीं बनवा सकती...अगर सरकार नहीं बनवा सकती है तो कम से कम पार्टी को ऐसी स्थिति में ही पहुंचा सके कि सरकार बनाने में उसकी पार्टी की अहम भूमिका हो। बीजेएसपी की योजना का पता लगते ही बीजेपी ने भी अपने एक सिपहसलार कैलाश विजवर्गीय को प्रज्ञा सिंह ठाकुर के पीछे लगा दिया है। विजयवर्गीय ने डंके की चोट पर ये कह दिया है कि प्रज्ञा सिंह के ख़िलाफ़ महाराष्ट्र एटीएस के पास कोई सबूत नहीं है और ये सब कांग्रेस के इशारे पर किया जा रहा है ताकि चुनाव तक प्रज्ञा को राजनीति से दुर रखा जा सके।
खैर ये तो रही बात राजनीति की....लेकिन जिस तरह से लेफ्टिनेंट कर्नल पी एस पुरोहित जैसे बड़े सेना अधिकारी को इस मामले में गिरफ़्तार किया जा रहा है उससे ये भी जाहिर होने लगा है कि नफरत की आग सेना में भी फैलने लगी है। हमेशा से ही सेना के अनुशासन और उसकी छवि की सराहना की जाती रही है...पर मालेगांव धमाके जैसे मामलों ने उस छवि को धूमिल कर दिया है...साथ ही लोगों को ये सोचने पर भी मजबूर कर दिया है कि क्या अब सेना ऐसे लोगों के हाथों में जिनकी मानसिकता किसी आम कट्टरवादी उपद्रवियों जैसी है या फिर कहीं इस मामले में भी सेना के अधिकारी किसी साजिश के शिकार तो नहीं हो रहे हैं ? दोनों ही हालातों में मामला काफी संगीन और संवेदनशील हो गया है

Monday, 3 November 2008

हां..मैंने राज ठाकरे को छूट दी...

जैसे-जैसे प्रधानमंत्री पर राज ठाकरे के मामले में दबाव बढ़ता जा रहा है...इस मामले से ताल्लुकात रखने वाले लोग अपने रक्षा कवच का जुगाड़ करने में जुट गए हैं। पिछले दिनों रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने इस्तीफे की धमकी देकर केन्द्र सरकार पर शिंकजा कस दिया॥ये अलगबात है ये आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए उनकी मजबूरी
है। बिहार और उत्तर प्रदेश का हर छोटा बड़ा नेता इस मामले को भुनाने में लगा हुआ है...चाहे वो बिहार का एक निर्दलीय विधायक हो जो अपने समर्थकों के साथ मुंबई में छठ मनाना चाह रहा है या फिर उत्तर प्रदेश का अबु ज़मी जो राज ठाकरे और उनके कार्यकर्ताओं को ललकार कर मुंबई में उत्तर भारतीयों को उनके हाल पर छोड़ देते हैं।
राज ठाकरे ने मुंबई में ऐसी भट्ठी सुलगाई है जिसपर उनके अलावा उत्तर भारत के भी नेता लोग अपनी-अपनीरोटियां सेंक रहे हैं। आखिर क्यों ना हों अगर बिना मेहनत किए मुफ्त में किसी को सुलगती हुई भट्टी मिल जाए तो कोई भी आदमी उस पर अपनी रोटियां सेंकना चाहेगा।
खैर जिन्लोंगो पर इस भट्ठी को बुझाने की जिम्मेदारी थी वो भी इस जुगाड़ में ही लगे रहे कि उसपर अगर उनकी भी दो चार रोटियां सिंक जाए तो क्या बुरा है...यहां मैं बात कर रहा हूं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख की। इनके नाम में देश का जिक्र जरूर है लेकिन ये अपने विलास में इतने डूबे हुए हैं कि इन्हे देश की फिक्र ही नहीं है। के खबरिया चैनल को दिए गए इंटरव्यू में भी उन्होने माना कि फरवरी में जब राज ठाकरे का उन्माद शुरूआती दौर में था तो उन्होने ढ़िलाई बरती। मुख्यमंत्री ने बिना हिचक के ये कबूल कर लिया कि जिस वक्त सड़कों पर उत्तरभारतीयों को पीटा जा रहा था तो वो इसे सख्ती से रोकने के बजाए उसके नतीजों का विश्लेषण कर रहे थे। अब जब केन्द्र सरकार ने कड़ा रूख अपना लिया है तो ऐसे में वो भी राज ठाकरे को सबक सिखाने का मन बना रहे हैं। उनके लिए राज ठाकरे के अब तक के गुनाह उसे सज़ा दिलाने के लिए काफी नहीं हैं...देशमुख का कहना है कि अगर अब राज ठाकरे ने कोई हरकत की तो उन्हे ऐसी धाराओं के तहत गिरफ़्तार किया जाएगा जिसके तहत ज़मानत मिलना मुश्किल होगा।
तो मिस्टर सीएम अब आप फिर किसी उत्तर भारतीय की हत्या का इंतजार कर रहे हैं ताकि आप इस हत्या के आरोप मे राज ठाकरे पर कार्रवाई कर अपनी पुरानी छवि को साफ कर सकें। विलासराव ने उत्तर भारतीय नेताओं...ख़ास करके लालू प्रसाद यादव और अमर सिंह पर भी मामले का राजनीतिकरण करने का रोप लगाया...शायद वो ये कहते वक्त अपने गिरेबान में झांकना भूल गए होंगे।
अब तो हद हो गई...

अब तो लगने लगा है कि महाराष्ट्र में दोगलों का राज हो गया है...जो मुंह पर कुछ और पीठ पीछे कुछ और कहता है।
मुंबई में रोज उत्तर भारतीयों की हत्या हो रही है और रोज ही वहां के हुक्मरान इन घटनाओं को आपसी रंजिश बताने पर तुले हुए हैं। कभी पवन की मौत पर सफाई दी जाती है..कभी राहुल राज की हत्या को जायज ठहराया जाता है तो कभी धर्मदेव राय के प्रकरण को महज सीट की लड़ाई बताया जाता है। कुल मिलाकर महाराष्ट्र के हुक्मरान ये मानने को तैयार नहीं है कि मुंबई में जिस कदर चुन-चुन कर उत्तर भारतीयों को मारा जा रहा है वो
क्षेत्रवाद की आग है। इसी कड़ी में नया नाम जुड़ा है उत्तर प्रदेश के फैजाबाद ज़िले के जयमंगल का...जिसकी मौत
एक अस्पताल में हो गई। इस उत्तर भारतीय को भी राज ठाकरे के फैलाए उन्माद का ही खामियाजा भुगतना
पड़ा।
जयमंगल मुंबई में सब्जी का ठेला लगाता था जो मनसे कार्यकर्ताओं को रास नहीं आया और उन्होने जयमंगल को सुना दी सजा-ए-मौत। ऐसा ही कुछ हुआ मलाड़ इलाके में भी जहां राज ठाकरे के कुछ चमचों ने उत्तर भारतीयों पर कहर बरपा दिया। इस दौरान पूरे मामले की तस्वीर उतार रहे एक उत्तर भारतीय रिपोर्टर दीनानाथ तिवारी को भी उपद्रवियों के गुस्से का शिकार बनना पड़ा।
उन्होने इस पत्रकार को इस कदर पीटा की वो गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हैं। ऐसा नहीं है कि इस घटनाक्रम के दौरान वहां पुलिस मौजूद नहीं थी बल्कि ये सारा उपद्रव थाने के आगे ही हो रहा था। इस घटना को अंजाम दे रहे
थे मनसे के पार्षद की अगुवाई में राज ठाकरे के कुछ चमचे। मुंबई पुलिस के फुर्तीले और बहादुर जवान (जैसा कि
राहुल राज की हत्या के बाद उपमुख्यमंत्री आर आर पाटिल ने कहा था ) मूक तमाशबीन की तरह हाथ बांधे इस
तमाशे को देख रहे थे। उन्हे भी इसमें मजा आ रहा था क्यों कि उन्हे बिना टिकट के ही मौत का तमाशा देखने को मिल रहा था। ये पुलिसकर्मी जब एक पत्रकार को भी बचाने से पहले उसकी नस्ल की पड़ताल करते हैं तो इनसे
मुंबई में रह रहे आम उत्तर भारतीयों की सुरक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है। आने वाले कुछ ही दिनों में उत्तर भारतीयों का बहुत ही ख़ास पर्व छठ है और इस मौके पर भी उत्तर भारतीयों की सुरक्षा की जिम्मेदारी इन्ही पुलिसकर्मियों को सौंपी गई है।
एक तरफ जहां रोज ही किसी ना किसी उत्तर भारतीय के मारे जाने की ख़बर आ रही है तो ऐसे वातावरण में शांतिपूर्वक तरीके से छठ पर्व मनाने की उम्मीद कैसी की जा सकती है। और अगर उस मौके पर एक साथ जमा
हुए उत्तर भारतीयों के धैर्य का बांध टूट गया तो क्या शहर में अमन चैन के बहाल रहने की गारंटी दी जा सकेगी। जब
भाई ही भाई के खून का प्यासा हो जाए तो क्या ऐसे में मौके की ताक में बैठे बाहर के दुश्मन इसका फायदा नहीं
उठा लेंगे। इतनी छोटी सी बात अगर मेरे जैसे तुच्छ आदमी के दिमाग में आ सकती है तो ये बात मराठियों का नेता होने का दंभ भर रहे राज ठाकरे के भेजे में क्यों नहीं घुस रही है। अगर वो खुद को इतना ही बड़ा नेता मानते
हैं तो वो उन ताकतों को क्यों नहीं महाराष्ट्र से खदेड़ देते हैं जो समय-समय पर बम धमाकों से भारत मां के सीने को छलनी कर रहे हैं। क्या उनके अंदर इतनी कूबत नहीं है या फिर एयर कंडीशन के कमरे में बैठकर उनका खून इतना सर्द हो गया है कि उससे केवल नफरत की की फसल उगाई जा सकती है। राज ठाकरे को तो मैं खुली चुनौती देना चाहता हूं कि अगर महाराष्ट्र के चप्पे-चप्पे पर उनकी इतनी ही पकड़ है तो केवल एक आतंकवादी को ही पकड़ के बताएं। या फिर धर्मदेव के पिता की बात मानकर खुद को उत्तर भारतीयों के हवाले कर दें । आपको बता दें कि
धर्मदेव के पिता ने महाराष्ट्र सरकार के दो लाख के मुआवजे की पेशकश कोठुकरा दिया है और उन्होने राज ठाकरे की जान के बदले में महाराष्ट्र सरकार को बीस 20 रुपए का मुआवज़ा देने की पेशकश की

Thursday, 30 October 2008

अधर्मियों ने की धर्मदेव की हत्या...

दृश्य एक-
मुंबई की बेस्ट बस को पटना के एक युवक राहुल राज ने की अगवा करने की कोशिश...मुंबई पुलिस ने ग़जब की फुर्ती दिखाते हुए उसे मौत के घाट उतार दिया...महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री आर आर पाटिल का बयान- अगर राहुल राज को गोली नहीं मारी जाती तो वो यात्रियों को नुकसान पहुंचा सकता था। महाराष्ट्र में अमन चैन को कायम रखने की दुहाई देते हुए पाटिल साहब पुलिस की कार्रवाई को सही ठहराते हैं।

दृश्य दो-
मुंबई की लोकल ट्रेन का नज़ारा..सब ओर गहमा गहमी का आलम...तभी कुछ लोग इस ट्रेन के एक डिब्बे में घुसते हैं और ऐलान करते हैं- अगर कोई भईया लोग सीट पर बैठा है तो वो खाली कर दे...इस बीच उन लोगों ने सीट पर बैठे धर्मदेव राय और उसके तीन साथियों से उनका नाम पता पूछा और फिर उतर आए मुंबईया गुंडागर्दी र...उन्होने धर्मदेव की लात घूंसों से वो हालत बना दी कि उसने अस्पताल में दम तोड़ दिया। खचाखच भरी लोकल ट्रेन में सबके सामने ये घटना हुई...लेकिन किसी ने इसका विरोध नहीं किया..क्यों कि वहां मौजूद ज़्यादातर लोग मराठी थे और जिसपर जुल्म हो रहा था वो उत्तर भारतीय था। यानि उनलोगों की भी इस पूरे मामले में मौन हमति थी। डिब्बे में मौजूद जो मुट्ठी भर उत्तर भारतीय लोग थे वो अपने अंजाम को सोचकर चुपचाप बैठे थे।

दृश्य एक में जिस मुंबई पुलिस ने अपनी कार्य कुशलता पर अपनी पीठ थपथपाई थी..वो भी चुप थी। जीआरपी केजवान भी खामोश थे...पर सबसे अलग महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री आर आर पाटिल ने अपनी चुप्पी तोड़ी और कह दिया कि ये मामला महज सीट की लड़ाई को लेकर था और इसमें क्षेत्रवाद की कोई भूमिका नहीं थी।

दो दृश्य..दोनों ही जगह मामले में काफी समानता... लेकिन एक ही प्रशासन और एक ही उपमुख्यमंत्री के नजरिए में दो ध्रुवों जितना फासला। क्या इस मामले में जीआरपी के जवानों ने इसलिए दखल नहीं दिया क्यों कि इस बार पीड़ित कोई उत्तर भारतीय था ?

क्या मुंबई पुलिस ने 18 घंटे तक इसलिए मामला दर्ज नहीं किया क्यों कि इस बार आरोपित मराठी थे ? क्यों इस बार उपमुख्यमंत्री आर आर पाटील को धर्मदेव की हत्या करने वाले लोग ख़तरनाक नहीं लगे केवल इसलिए क्यों
कि वो राज ठाकरे के चमचे थे ?
क्यों विलासराव देशमुख को कड़ी कार्रवाई करने का बयान देने के लिए केन्द्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल के फोन का इंतजार करना पड़ा ? क्यों जीआरपी के अधिकारियों को रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव की फटकार सुनने के बाद
होश आया ? इन सब दबावों के बाद तुरत में ऐसे क्या सुराग हाथ लग गए कि शक के आधार पर बीस लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया ? क्या ये गिरफ़्तारी पहले भी हो सकती थी ? अगर ऐसे राजनीतिक दबाव नहीं बनाए जाते तो क्या बीस लोगों की गिरफ्तारी हो पाती ?
खैर मेरे सवालों की फेहरिस्त तो बहुत लंबी है...और मुझे ये भी पता है कि मुंबई के हुक्मरान और प्रशासन इन सवालों के गोलमोल जवाब दे भी देंगे...लेकिन क्या ये लोग गोरखपुर में इंतजार कर रहे धर्मदेव के उस छोटे से बेटे को मना पाएंगे- जो दिवाली पर घर नहीं आने से अपने पापा से कुट्टी होकर बैठ गया है ? क्या ये लोग धर्मदेव की विधवा की सूनी मांग का सिंदूर और टूटे हुए सपनों को वापस ला पाएंगे ? कहते हैं कि पुराने जमाने में राजयोग पाने के लिए लोग पशुओं की बलि देते थे लेकिन अब राज ठाकरे जैसे मुट्ठी भर थाकथित नेता अपने राजयोग केलिए इंसानों की बलि दे रहे हैं। अब तो मेरी आस्था महाराष्ट्र के हुक्मरानों से उठ चुकी है पर भगवान से मैं ये विनती जरूर करूंगा कि या तो राज ठाकरे जैसे नेता को सदबुद्धी दे दो या फिर उसके राजयोग का रास्ता साफ कर दो ..ताकि कम से कम इस नरबलि का सिलसिला तो रुके।

साध्वी को साध्वी का सहारा....

मध्यप्रेदश की एक साध्वी को मध्यप्रदेश की ही दूसरी साध्वी ने सहारा दिया है। इसमें पहली साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर हैं जिसे मालेगांव ब्लास्ट के मामले में गिरफ़्तार किया गया है..जबकि दूसरी साध्वी हैं मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती।
वैसे उमा भारती ने तो पहले ही प्रज्ञा सिंह ठाकुर को क्लीन चीट दे दी थी..लेकिन अब उमा भारती की पार्टी भारतीय जनशक्ति पार्टी ने प्रज्ञा को विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट देने की पेशकश की है। ये बात कोई चोरी-छिपे नहीं की जा रही है बल्कि इस प्रस्ताव का ऐलान पार्टी के राष्ट्रीय सचिव इंदर प्रजापत ने डंके की चोट पर किया है। उन्होने प्रज्ञा को मध्यप्रदेश के किसी भी इलाके से चुनाव लड़ने की सहूलियत देने की भी पेशकश की है।
उमा भारती की पेशकश यहीं ख़त्म नहीं होती है...उन्होने इससे भी एक कदम आगे बढ़कर प्रज्ञा को कानूनी मदददेने का भी प्रस्ताव दिया है। इंदर प्रजापत ने ये दावा किया है कि प्रज्ञा जल्दी ही बेगुनाह साबित होकर मामले से बाइज्जत बरी हो जाएंगी।
अब सवाल ये उठता है कि क्या वाकई उमा भारती को प्रज्ञा के बेगुनाह होने का भरोसा है या फिर वो हिन्दुत्व की बहती बयार में प्रज्ञा के तुरुप का पत्ता फेंककर विधानसभा में एक सीट पक्की करना चाहती है। क्यों कि उमा भारती ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली है...उसे पता है कि जिस तरह पिछले चुनाव में वो हिन्दुत्व की आंधी में दिग्विजय सिंह की सरकार को बहा ले गई थी...शायद इस बार भी ऐसा ही कोई करिश्मा हो जाए।
इससे पहले बीजेपी ने ये कहकर प्रज्ञा से किनारा कर लिया था कि...पार्टी का उससे कोई लेना देना नहीं है जबिक राजनीतिक गलियारे का हर आदमी जानता है कि प्रज्ञा सिंह ठाकुर गिरफ़्तार होने से पहले तक बीजेपी के विभिन्न संगठनों से जुड़ी रही हैं। उमा भारती ने बीजेपी के इसी रवैये को भुनाने की कोशिश की है ताकि बीजेपी के बयानों से आहत प्रज्ञा सिंह ठाकुर को वो अपने फ्रेम में उतार सके।
अब सवाल ये उठता है कि क्या ये भारतीय जनशक्ति पार्टी का दिवालियापन है कि वो एक आतंकी कार्रवाई की आरोपित को अपना उम्मीदवार बनाने की पहल कर रही है। ऐसा नहीं है कि पहले किसी पार्टी ने किसी अपराधी को अपना उम्मीदवार नहीं बनाया है लेकिन ऐसे मामलों में खुद अपराधी ही राजनीतिक दलों से संपर्क बनाते रहे हैं...और इस बार बीजेएसपी ने प्रज्ञा सिंह के सामने पेशकशों की झड़ी लगाकर अपनी विचारधारा को जगजाहिर कर दिया है।

देश बिकता है...बोलो, खरीदोगे

पिछले दिनों साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को गिरफ़्तार कर लिया गया और उसपर आतंकवादी होने का आरोप चस्पा कर दिया गया। इस मुद्दे पर बीजेपी ने काफी बवाल मचाया लेकिन उनका सरोकार बस इतना भर था कि वो इस
साध्वी का अपनी पार्टी से किसी तरह के रिश्ते से इंकार कर रहे थे। उन्होने इस बात का विरोध करने की कभी कोशिश नहीं की कि साध्वी ने मालेगांव में विस्फोट नहीं किया।
खुद को हिन्दुत्व का सबसे बड़ा पैरोकार बताने वाली इस पार्टी का ये रवैया भले ही कट्टर हिन्दुवादी ताकतों को रास नहीं आया हो...लेकिन अगर देशहित में सोचा जाए तो बीजेपी का ये रवैया वाकई सराहनीय है। बीजेपी के इस रवैये से वोट की राजनीति कर रहे उन नेताओं को सबक लेना चाहिए जो बाटला हाउस इनकाउंटर को फर्जी बताने पर तुले हुए हैं...वो भी तब जब इस इनकाउंटर के बाद पकड़े गए आरोपितों ने अपना जुर्म कबूल लिया है।
यहां पर ये भी देखने वाली बात है कि चाहे वो बाटला हाउस में पकड़े गए आज़मगढ़ के युवक हों या फिर मालेगांव विस्फोट के आरोप में पकड़ी गई साध्वी...दोनों ही मामलों में उनके परिजनों ने साफ कर दिया कि अगर उन पर आरोप साबित हो जाए तो कानून के तहत उन्हे सजा दी जाए।
आपको बता दें कि प्रज्ञा सिंह ठाकुर के पिता ने उसकी फोटो अपने मंदिर में लगा रखी है और रोज उसकी पूजा करते हैं...इससे इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि एक शख़्स ने अपने मुल्क के आगे अपने भगवान को भी नहीं बख्शा। मेरा मन ऐसे जज्बे को सलाम करना चाहता है। इससे इस नतीज पर भी पहुंचा जा सकता है कि
हर देशभक्त को अपने कौम, अपने भगवान और अपने हितों से ऊपर अपने देश को रखना चाहिए।
लेकिन ऐसे लोगों पर मुझे तरस आता है जो बाटला हाउस मामले में एक शहीद की शहादत को भी साजिश का र्जा दे देते हैं। मैं ये नहीं कहता हूं कि बाटला हाउस में जो भी हुआ वो सही हुआ लेकिन... जो कुछ भी हुआ वो गलत हुआ...इस नतीजे पर पहुंचने में भी हमें जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए...वो भी केवल इस लालच में कि हमें अल्पसंख्यकों का वोट बैंक मिल जाए।
अल्पसंख्यक आयोग के एक रिपोर्ट का हवाला दें तो आज भारत में पढ़े लिखे डिग्री धारक बेराजगार मुसलमानों की संख्या बढ़ती जा रही है...क्या कभी इन अमरबेल की तरह पेड़ रूपी देश को खोखला करने वाले नेताओं ने उन अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए कुछ किया ? क्या कभी उनकी काबिलियत के मुताबिक उन्हे नौकरी दिलाने की कोशिश की ? इस बात का जिक्र आते ही ये नेता आरक्षण की डफली बजाने लगते हैं...क्या इस समस्या का समाधान आरक्षण है ?
कहते हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है...और ऐसा ही कुछ इन आतंक फैला रहे नासमझ युवाओं के साथ भी हो रहा है। इस वोट बैंक की राजनीति के जीते जागते उदाहरण मध्यप्रदेश के एक मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी हैं जिन्होने साध्वी को क्लीन चिट दे दी। अपनी पार्टी कीलाइन से हटकर क्लीन चिट देने की मंत्री जी की मजबूरी भी मध्यप्रदेश में नवम्बर में होने वाला चुनाव हो सकती है। कुल मिलाकर यहां पर ये कहना उचित होगा कि आज के कुछ राजनेता देश पर राज करने के लिए उसका सौदा करने को भी तैयार हैं।

Wednesday, 29 October 2008

आखिर कब तक

मध्यप्रदेश....भारत का हृदय प्रदेश...मध्यप्रदेश में 25 नवंबर को चुनाव होने हैं....प्रदेश में मौजूदा सरकार है
बीजेपी की...230 विधानसभा सीट और 29 लोकसभा सीट हैं मध्यप्रदेश में..पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं प्रदेश की यहां 29 लोकसभा की सीटें हैं...
अब चुनाव सर पर हैं तो चुनाव के कुछ मुद्दे भी होंगे...बीजेपी की मौजूदा सरकार के ख़िलाफ़ कांग्रेस भ्रष्टाचार को मुद्दा बना रही है...मुद्दा बिजली, सड़क और पानी भी है...इन्हीं को मुद्दा बना कर पिछले चुनाव में बीजेपी ने कांग्रेस को पटखनी दी है... लेकिन अब तस्वीर का रुख उल्टा हो गया है....बीजेपी के ही मुद्दों पर कांग्रेस बीजेपी को घेर रही
है...
प्रदेश में पिछले पांच सालों में कितना विकास हुआ इसका हिसाब विपक्ष बीजेपी की सरकार से मांग रहा है... ऐसे में बीजेपी सरकार बचाने के लिए क्या करे...अब लगता है काफी सोच समझ कर बीजेपी ने हिंदुत्व का तीर चलाने का मन बना लिया है... इसकी एक बानगी दिखी इंदौर में...मालेगांव ब्लास्ट मामले में गिरफ़्तार श्याम साहू के घर पहुंचे प्रदेश के ताकतवर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय....कैलाश विजयवर्गीय की छवि मध्यप्रदेश में वही है जो गुजरात में नरेंद्र मोदी की है...इन महाशय को मध्यप्रदेश का मोदी भी कहा जाता है...इंदौर दंगों के समय इन्होंने ही दंगों में सिमी का हाथ बताया था....लेकिन कोई ठोस सबूत मुहैया नहीं करा पाए थे..
तो श्याम साहू के घर कैलाश विजयवर्गीय का पहुंचान अचानक नहीं था....मध्यप्रदेश की मौजूदा सरकार अपने विकास के एजेंडे पर तो अपनी गद्दी बचाने से रही...उसके बाद जो कसर बची थी उसे साध्वी उमा भारती की बग़ावत ने पूरा कर दिया....उमा बीजेपी को हिंदुत्व के मुद्दे पर घेरने की कोशिश कर रही हैं....
मालेगांव ब्लास्ट में गिरफ़्तार साध्वी प्रज्ञा के समर्थन में सबसे पहले उमा भारती हीं उतरीं थी...उमा ने साफ-साफ कहा था कि प्रज्ञा एबीवीपी की कार्यकर्ता थी....उमा से वार से बीजेपी के नेता तीलमिला उठे...गले की फांस बन गईं प्रज्ञा...न तो उगलते बनता था न निगलते...काफी ना नुकर के बाद माना की प्रज्ञा का बीजेपी से संबंध था.... बात इतने से बनती नज़र नहीं आई तो कैलाश विजयवर्गीय पहुंच गए श्याम साहू के घर...कहा वो हमारे पुराने कार्यकर्ता हैं...कांग्रेस चुनावी लाभ के लिए हिंदुओं को आंतकवादी घोषित कर रही है...
यानी बीजेपी ने अब तय कर लिया है कि और कहीं हो न हो मध्यप्रदेश में उसका मुख्य मुद्दा हिंदुत्व ही होगा....हिंदुत्व के इस एक वार से साध्वी उमा भारती और कांग्रेस दोनों को चित करना चाहती है बीजेपी... मान लें
हिंदुत्व का मुद्दा एक बार सही भी है...लेकिन क्या प्रदेश की जनता को ये जानने का अधिकार नहीं है कि बीजेपी की मौजूदा सरकार ने प्रदेश के विकास के लिए क्या किया...आखिर क्यों नहीं बीजेपी अपनी उपलब्धियों को आधार
बनाकर मध्यप्रदेश में चुनाव लड़ रही है....
आखिर कब तक आम लोगों को भावनात्मक शोषण करती रहेगी बीजेपी....आखिर कब तक

Sunday, 26 October 2008

कुछ यक्ष प्रश्न

दिवाली है...चारो तरफ खुशियां मनाने की तैयारी चल रही है...लेकिन एक ख़बर अभी सामने आई है...आप भी पढ़िए
दिवाली की पूर्व संध्या पर महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में छह किसानों ने आत्महत्या कर ली है.....विदर्भ जन आंदोलन समिति के अनुसार कीड़े लगने के कारण कपास, सोयाबीन और धान की फसल को नुकसान पहुंचने से किसानों ने यह कदम उठाया है.....ये किसान वर्धा, चंद्रपु, अकोला, भंडारा, यवतमाल और अमरावती जिलों से थे.....समिति के मुताबिक इस घटना के साथ इस वर्ष आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 626 हो गई है
श्रीलंका ने भारत को तमिलों की सुरक्षा का भरोसा दिलाया है....साथ ही श्रीलंका ने यह भी संकेत दिया है कि एलटीटीई के साथ संघर्ष से प्रभावित इलाक़े में भारत की ओर से चिकित्सा सहायता की अनुमति दी जा सकती है.श्रीलंका के राष्ट्रपति के विशेष सलाहकार ने भारतीय विदेश मंत्री से मुलाक़ात की और तमिलों की सुरक्षा के लिए उठाए जा रहे क़दमों की जानकारी दी.भारत ने पिछले दिनों श्रीलंका सरकार से कहा था कि वह तमिलों के अधिकारों की रक्षा करे.श्रीलंका के तमिलों के मुद्दे पर केंद्र की सत्ताधारी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार में सहयोगी द्रमुक ने कड़ा रुख़ अपनाया है.तमिलनाडु में सत्ताधारी द्रमुक के कई सांसद इस मुद्दे पर पार्टी प्रमुख करुणानिधि को अपना इस्तीफ़ा तक सौंप चुके हैं.चेन्नई में 14 अक्तूबर को श्रीलंका के तमिलों के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक हुई थी। जिसमें यह फ़ैसला हुआ था कि अगर 29 अक्तूबर तक केंद्र सरकार श्रीलंका के उत्तर में संघर्षविराम करवाने के लिए क़दम नहीं उठाती तो राज्य के सभी सांसद इस्तीफ़ा दे देंगे.
मलेशिया में प्रधानमंत्री आवास के बाहर इकट्ठा होने के कारण गिरफ्तार किए गए हिंदू राइट्स एक्शन फोर्स (हिंद्राफ) संगठन के 10 सदस्यों को दोषी सिद्ध होने पर पांच साल की कैद हो सकती है.....हिंद्राफ के इन कार्यकर्ताओं को उस समय गिरफ्तार किया गया जब वे अपने पांच नेताओं की रिहाई की मांग को लेकर प्रधानमंत्री अब्दुल्ला अहमद बदावी को एक ज्ञापन सौंपने वाले थे।
कृषि मंत्री और क्रिकेट बोर्ड अध्य्क्ष, शरद पवार हैं...इसलिए जब विदर्भ के किसान कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या करते हैं तो शरद पवार उन्हें सलाह देते हैं कि जमीन बेच दो और नौकरी करो, खेती में कुछ नहीं रखा है...और जब भारतीय क्रिकेट टीम 20-20 नाम का एक तमाशाई टूर्नामेंट जीत जाती है तो वे बोर्ड की तरफ से टीम को 12 करोड़ रुपए और युवराज सिंह को एक ओवर में 6 छक्के लगाने के लिए 1 करोड़ रुपए के इनाम का एलान करते हैं।
कुछ ख़बरें थी...कुछ आज की और कुछ पुरानी...विदर्भ हमारे ही देश का एक हिस्सा है..रिपोर्ट की माने तो ३२ लाख किसानों का ये इलाक़ा हर रोज तीन लोगों की आत्महत्या का गवाह बनता है...दक्षिण भारत की एक पार्टी श्रीलंका के तमीलों की सुरक्षा के लिए मरी जा रही है...क्या हम तमीलों के मामले में हस्तक्षेप कर श्रीलंका के आतंरिक मामले में दखल नहीं दे रहे हैं...यही पार्टी मलेशिया में हिंद्राफ कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी पर भी हंगामा काटती है...लेकिन क्या वाकई हम अपने दुखों से उबर चुके हैं कि अब हमें दूसरों के दुख दूर करने की तरफ ध्यान देने की जरूरत है....
आखिर क्यों नहीं किसी पार्टी के सांसद विदर्भ को मुद्दा बनाकर संसद से इस्तीफ़ा देते हैं...आखिर तब अपनी जान देते रहेंगे विदर्भ के किसान...क्या शऱद पवार सिर्फ बीसीसीआई के नेता हैं...एक क्रिकेटर को 6 छक्के मारने पर एक करोड़ और टूर्नामेंट जीतने पर टीम को बारह करोड़ लेकिन विदर्भ के किसानों को क्या....क्या पवार वाकई दिवाली मनाने के हक़दार हैं...
मुंबई से बिहारियों को बाहर निकालने के मुहिम चलाए राज ठाकरे क्यों नहीं विदर्भ से गरीबी को बाहर निकालने की मुहिम चलाते हैं...क्यों नहीं राज ठाकरे विदर्भ के किसानों को मौत के मुंह से बाहर निकालने की मुहिम चलाते हैं...क्या वाकई राज ठाकरे दिवाली मनाने के हक़दार हैं....
हर रोज़ विदर्भ में किसान जान दे रहे हैं...हर रोज कुछ घरों के चिराग बुझ रहे हैं...हर रोज महानगरों में नए-नए माल खुल रहे हैं...हर रोज शेयर बाज़ार में नई कंपनियां लिस्ट हो रही है...क्या वाकई माहौल ऐसा है कि उत्सवधर्मी हुआ जाए...

राज ठाकरे का उत्तर प्रेम

दीवाली नजदीक है और आजकल विदेशों से भी दीवाली के मौके पर समारोह आयोजित करने की ख़बरें आ रही हैं।इससे पहले दशहरे के मौके पर भी विदेशों में गरबे का आयोजन किया गया था...लेकिन मुंबई में रह रहे उत्तर
भारतीय वहां पर छठ मनाने से घबड़ा रहे हैं।
पिछले दिनों जब मुंबई में उत्तर भारतीयों पर जुल्म ढ़ाया जा रहा था तो रेल मंत्री श्री लालू प्रसाद यादव ने जूहू के समुद्र तट पर छठ मनाने का ऐलान किया था...ये अलग बात है शायद अब वो अपने विचार बदल दें॥क्यों कि हमेशा से ही राजनेताओं के बारे में ये कहा जाता रहा है कि वो कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। बहरहाल हाथ कंगन को आरसी क्या छठ आने में अब चंद रोज ही बचे हैं...जहां इतने महीने कट गए वहां ये चंद रोज भी जल्दी ही गुजर जाएंगे।
अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी मुंबई में छठ के मौके पर लाउड स्पीकर बजाने की अनुमति दे दी है॥इससे मुंबई में रह रहे उत्तर भारतीयों का मनोबल भी ऊंचा हुआ है क्यों कि उनको अब लगता है कि मुंबई में छठ मनाने के उनके अधिकार को सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी मुहर लगा दी है।
अब तो उत्तर भारतीयों को चाहिए कि वो छठ के मौके पर सूर्य भगवान से राज ठाकरे को सदबुद्धि देने की कामना जरूर करें...क्यों कि अब तक जब भी राज ठाकरे मुसीबत में घिरे हैं उत्तर भारतीयों ने ही उनका बेड़ा पार किया है। अब सवाल ये उठता है कि अगर राज ठाकरे पूरे महाराष्ट्र से उत्तर भारतीयों को खदेड़ देना चाहते हैं तो उन्हे गणपति बप्पा मोरया के नारे लगाने का भी कोई हक नहीं है। इसके पीछे की वजह भी भगवान गणेश का उत्तर भारतीय होना ही है क्यों कि अगर धार्मिक ग्रन्थों को सही माने तो भगवान शिव का पूरा परिवार हिमालय के कैलाश पर्वत पर निवास करता है॥और भगवान शिव के पुत्र होने के नाते भगवान गणेश भी तो कैलास पर्वत के ही निवासी हुए...और ये बताने की जरूरत नहीं है कि कैलास पर्वत भी उत्तर भारत में ही है। यहां ये बताना भी जरूरी हो
जाता है कि राज ठाकरे समेत उनके कई परिजनों की शिक्षा दीक्षा में भी कई उत्तर भारतीय शिक्षकों का हाथ रहा है।
ऐसे में अगर राज ठाकरे उत्तर भारतीयों को महाराष्ट्र से बाहर निकालना ही चाहते हैं...तो शुरूआत उन्हे इन्ही उत्तर
भारतीयो से करना चाहिए क्यों कि इन उत्तर भारतीयों से ज़्यादा क़रीब उनके शायद ही कोई हो।
संविधान में भी इस बात का उल्लेख है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत एक है...हो सकता है कि राज ठाकरे को ऐसा लग रहा हो कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक अगर एक लाइन खींची जाए तो वो महाराष्ट्र को छूकर नहीं जाती है इसलिए महाराष्ट्र का भारत में बने रहना उसका ऐच्छिक अधिकार हो...पर हक़ीक़त क्या है ये सब जानते हैं...
अगर थोड़े तल्ख लहजे में कहा जाए तो महाराष्ट्र राज ठाकरे की मिलकियत नहीं है कि उन्होने जिसे चाहा राज्य में आने दिया और जिनसे नाराज़ हुए उन्हे राज्य से तड़ीपार करने का हुक्म जारी कर दिया

Friday, 24 October 2008

क्या सुप्रीम कोर्ट का आदेश लागू हो पाएगा मुंबई में ?

सुप्रीम कोर्ट ने छठ पूजा के दौरान मुंबई में लाउडस्पीकर लगाने की अनुमति दे दी है...अब अगर राज ठाकरे की एमएनएस कोई हुड़दंग करती है तो ये सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन माना जाएगा।
इससे पहले महाराष्ट्र सरकार ने जुहु बीच पर लाउडस्पीकर लगाने पर रोक लगाने का फैसला किया था। इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए सु्प्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के जी बालकृष्णन की खंडपीठ ने ये निर्देश दिए। सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के एक एनजीओ सिटीजन्स ग्रुप की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि छठ पूजा में भीड़ को नियंत्रित करने के नाम पर राजनीतिक भाषण दिए जाते हैं। सिटीजन्स ग्रुप ने दलील दी थी कि इसी छूट का लाभ उठाते हुए पिछले वर्ष छठ पूजा के दौरान रात भर सांस्कृतिक कार्यक्रमचलते रहे।
दिलचस्प है कि एमएनएस हमेशा ही मुंबई में छठ पूजा के आयोजन का विरोध करती रही है। यहां देखना ये होगा कि हमेशा ही कानून को अपने हाथ में लेने वाली एमएनएस क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करेगी। इसके पहले भी उसने कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन करते हुए गुण्डागर्दी की थी। क्या महाराष्ट्र की पुलिस इस बार छठ में उनकी गुण्डागर्दी रोक पाएंगे। क्या इस बार बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के लोगों को ये अहसास होगा कि मुंबई उनकी भी है। या फिर 'मुंबई मेरे बाप की है' कहने वाले नेताओं के शह पर गुण्डा तत्व सड़कों पर नंगई करेंगे।
ये महाराष्ट्र की उस कांग्रेसी सरकार के लिए भी बड़ा सवाल होगा क्योंकि उसी कांग्रेस पार्टी की सरकार को बिहार और यूपी के लोगों की झंडाबरदारी करने वाले बड़े-बड़े नेता केंद्र में उसका समर्थन करते हैं। यहां उल्लेखनीय ये है कि जब राज ठाकरे ने ये घोषणा की थी कि मुंबई में छठ पूजा नहीं होने दी जाएगी उसी समय बिहार के नेता और केंद्र में रेल मंत्री लालू प्रसाद ने कहा था कि वे खुद मुंबई में छठ पूजा करने जाएंगे।
कहीं बिहार के ये नेता केवल गीदड़भभकी ही देकर न रह जाएं कि राज ठाकरे पर कार्रवाई होनी चाहिए और कार्रवाई के नाम पर केवल राज ठाकरे को गिरफ्तार किया जाए और फिर हल्की धाराएं लगाकर छोड़ दिया जाए। इसलिए बिहार और यूपी के इन नेताओं से निवेदन है कि इस बार छठ पूजा के दौरान वे अपनी और अपने लोगों की अस्मिता की रक्षा करें।

राज एक रक्तबीज अनेक

महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के साथ जो कुछ भी हुआ निसन्देह वो ग़लत हुआ लेकिन उसके बाद जो कुछ हो रहा है उसे भी सही तो नहीं ठहराया जा सकता। राज ठाकरे ने तो अपने चाचा के दिखाए रास्ते पर चलकर काफी शोहरत बटोर ली। आपको याद दिला दें कि शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे ने भी अपने राजनीतिक कैरियर की शुरूआत इसी तरह से की थी। फर्क था केवल प्रान्त का...बाला साहेब ने दक्षिण भारतीयों को महाराष्ट्र से खदेड़ा था तो राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों को अपना निशाना बनाया।
इस पूरे मामले ने मुझे एक पौराणिक घटना की याद दिला दी जिसमें मां दुर्गा ने जब एक राक्षस रक्तबीज का वध किया तो उसके कटे धड़ से निकलने वाले खून के हर बूंद से एक-एक राक्षस का जन्म होने लगा। शायद ऐसा ही कुछ महाराष्ट्र में हुआ और ऐसा ही कुछ बिहार में भी हुआ। दोनों ही जगह अलग-अलग मिशन को अंजाम देने के लिए एक ही जैसे अनगिनत उपद्रवियों ने जन्म लिया।
महाराष्ट्र में तो उत्तर भारतीयों को निशाना बनाकर उन्हे वहां से खदेड़ा गया...लेकिन बिहार में किसे निशाना बनाया जा रहा है ? राज ठाकरे को ज़मानत मिलने के बाद से बिहार में शुरू हुई हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है।वहां पर खुद को छात्र कहने वाले गुण्डे सड़कों पर उतर आए हैं और खुलेआम प्रशासन की नाक के नीचे तांडव कर रहे हैं। उन्होने कई गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया...काफी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया...ये छात्र शायद अपनी इस करनी पर अपनी पीठ ठोंक रहे हों...पर मैं तो एक बात दावे के साथ कह सकता हूं कि ये जितना भी नुकसानहुआ है वो बिहार का ही हुआ है...महाराष्ट्र का नहीं।
उपद्रवियों ने कई ट्रेनों को रोक कर उसमें आग लगा दी और यात्रियों से लूटपाट की और ऐसे हालात बना दिए कि मजबूरन रेल विभाग को देश के कई हिस्सों में जाने वाली ट्रेनों को रद्द करना पड़ा। दिल्ली, मुंबई, मद्रास और ना जाने देश के कई हिस्सों में बिहार आने की तैयारी कररहे बिहारी फंसे हुए हैं...इनमें से ज़्यादातर यात्री ऐसे हैं जो त्योहारों के मौके पर अपने परिजनों के बीच अपने गृह प्रदेश लौटना चाहते हैं। ट्रेन रद्द होने के कारण बिहार के भी कई हिस्सों में वो यात्री हताश हैं जो कई महत्वपूर्ण कार्यों के कारण देश के दूसरे हिस्से जा रहे थे...हो सकता है कि इनमें से कई लोगों को समय पर काम पर नहीं लौटने के कारण नौकरी गंवानी पड़े॥या सबसे बुरा ये भी हो सकता है कि कोई यात्री बेहतर इलाज़ के लिए दिल्ली या मुंबई नहीं पहुंच पाने के कारण स्टेशन पर ही दम तोड़ दे।
क्या इन सब हालातों का जिम्मेदार भी राज ठाकरे ही होगा या फिर वे मौका परस्त बिहारी जो इस नफरत की आग को और भड़का कर अपनी रोटी सेंकने के चक्कर में हैं।
शायद इन उपद्रवियों को ये नहीं पता होगा कि राज ठाकरे को सलाखों के साए से निकालने का काम भी एक उत्तर भारतीय वकील ने ही किया है जो उत्तर प्रदेश के जौनपुर का रहने वाला है। इन सबसे अलग शायद राज ठाकरे को ये नहीं पता होगा कि उनके महाराष्ट्र में जितने उद्योग धंधे हैं उसका एक बड़ा बाज़ार उत्तर भारत ही है...अगर उस बाज़ार ने महाराष्ट्र में बनी चीजों का बहिष्कार करना शुरू कर दिया तो राज ठाकरे को अपने उन्ही भूमि पुत्रों को जवाब देना भारी पड़ जाएगा...जिसके तथाकथित सम्मान की लड़ाई वो लड़ रहे हैं।
राज ठाकरे को तो उत्तर भारत में हिंसा कर रहे उन उपद्रवियों को धन्यवाद देना चाहिए जो उनके ही काम को अपने तरीके से कर रहे हैं। क्यों कि अगर उत्तर भारत लोगों नफरत की आग को शक्ति बनाकर योजनाबद्ध तरीके से आंदोलन करने की कुशलता आ गई तो राज ठाकरे को ये सौदा महंगा पड़ सकता है।

Tuesday, 14 October 2008

क्या मैं काफिर हो गया हूं ?

क्या हमारे देश में पढ़े लिखे और जागरूक लोगों में हिंदुत्व और कट्टरता की भावना बढ़ रही हैं...मेरा अनुभव कहता है कि हां..हम लोग धीरे-धीरे हिंदू होते जा रहे हैं..बापू के हिंदुत्व को मानने वाले लोगों की संख्या कम हो
रही है.बढ़ रही है तो गोडसे से हिंदुत्व को मानने वाले लोगों की संख्या.... मैं जो कुछ कह रहा हूं इसके लिए मेरे पास बहुत बड़े सबूत नहीं लेकिन जो कुछ भी वो उसी के आधार पर मैंने ये निष्कर्ष निकाले है....

आखिर आज मैंने ये सवाल चुना हीं क्यों...दरअस्ल दो दिन पहले यानी सोमवार को राष्ट्रीय एकता परिषद
की बैठक थी..बैठक से पहले कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी एस येदुरप्पा में कहा कि ईसाई समाज पर जो हमले जो रहे हैं उसके लिए ईसाई समाज खुद जिम्मेदार है...वजह बताया उन्होंने धर्म परिवर्तन और सत्य दर्शिनी नाम की एक पुस्तिका को... मुझे एक जागरूक नागरिक होने के नाते येदुरप्पा का तर्क समझ में नहीं आया..कोई भी तटस्थ व्यक्ति इस तर्क को हजम नहीं कर सकता...आखिर आप किसी राज्य के मुख्यमंत्री हैं तो आप सिर्फ एक वर्ग, समाज या राज्य के एक खास इलाक़े के मुख्यमंत्री नहीं हैं....आपसे उम्मीद की जाती है कि आप अपने राज्य में रहनेवाले हर धर्म, जाति और वर्ग के आदमी की सुरक्षा करेंगे....लेकिन कर्नाटक में क्या हुआ..कुछ लोग ईसाई समाज पर हमले करते रहे और पूरे राज्य की मशिनरी चुपचाप उन हमलों को देखती रही....

मेरा सवाल ये हैं था कि येदुरप्पा क्यों नहीं पहले हालात को सुधारते हैं...क्यों नहीं हिंसा करनेवाले लोगों को
दंडित करते हैं...अगर ईसाई समाज कुछ लोगों ने गलती की है तो पूरे समाज को दंडित करना ये कहां का
न्याय हैं....और दंड भी कौन दे रहा है..क्या हिंसा करने वाले लोगों को वैधानिक अधिकार था हिंसा करने का...
अगर ईसाई समाज के कुछ लोगों ने अपराध किया है तो उन्हें क्यों नहीं सज़ा दी जाती...जाहिर है आपकी सरकार और प्रशासन निकम्मा है...

खैर मैने अपना पिछला पोस्ट येदुरप्पा को फोकस करते हुए लिखा था...मैंने कहा था कि ईसाई समाज पर हमले से जुड़ा येदुरप्पा का बयान कुतर्क है...  उस पोस्ट के बदले में मुझे कुल 6 टिप्पणियां मिली...उनमें से चार
टिप्पणियां बेहद रोष भरे अंदाज़ में लिखी गईं थी...मैंने येदुरप्पा के तर्क को कुतर्क कहा था तो टिप्पणी
करने वाले चार लोगों ने मेरे तर्क को कुतर्क कहा... 

ख़ैर ये सवाल उन न्यायप्रिय लोगों के लिए मैं छोड़ देता हूं कि आखिर कुतर्क कर कौन रहा है...मैं आज के सवाल पर लौटता हूं....क्या हम गोडसे वादी हिंदू होते जा रहे हैं....जो लोग इंटरनेट पर सर्फिंग करते हैं जाहिर है वो
ज्यादा जागरूक हैं....ऐसे जागरूक लोगों से हम जीवन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण की उम्मीद कर सकते हैं...हम ऐसे लोगों से उम्मीद कर सकते हैं कि वो किसी भी घटना को तर्क और तथ्यों के ज़रिए परखने के बाद ही कोई फ़ैसला करेंगे...अगर तर्क और तथ्य की दृष्टि से देंखे तो कर्नाटक में हिंसा गलत थी...उस हिंसा को सही ठहराना उससे भी गलत था...कुर्तक था...मैंने यही कहा था...

लेकिन उसके बदले मुझे जो प्रतिक्रिया मिली वो बेहद हिला देने वाली थी.. आम तौर पर माना जाता है कि देश का पढ़ा लिखा तबका सेक्युलर और सहिष्णुता से रहनेवाला है...लेकिन मेरा ये भ्रम टूटा है... मैं कहना चाहता हूं की मैं हिंदू हूं...लेकिन जीवन के प्रति मेरा नज़रिया वैज्ञानिक हैं...मैं बापू के हिंदुत्व को मानता हूं...मैं गोडसे वादी हिंदुत्व को नहीं मानता...

अपनी बात मुक्तिबोध के शब्दों में कहूं तो मैं कहना चाहूंगा की

समस्या एक मेरे सभ्य नगरों और गांवों की
सभी मानव, सुखी सुंदर व शोषण मुक्त कब होंगे


क्या मैं गलत हूं....
क्या मैं काफिर हो गया हूं ?