Tuesday, 14 October 2008

उफ ये अमरवाणी

समाजवादी पार्टी के बात बहादुर नेता अमर सिंह ने एक बार फिर एक अगल मुद्दे पर मुंह खोला है...बात बहादुर अमर सिंह ने उद्योगपति रतन टाटा के गुड एम और बैड एम से जुड़े बयान पर उनके खिलाफ़ केस दर्ज कराने की बात कही है.. अमर सिंह ने पश्चिम बंगाल समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष से कहा है कि वो रतन टाटा के ख़िलाफ़ मानहानि का मुकदमा दर्ज कराएं.... इस बार ममता बनर्जी के पक्ष में खड़े होते हुए अमर सिंह ने रतन टाटा के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला है...गौरतलब है कि नैनों प्रोजेक्ट को सिंगूर से साणंद ले जाते समय रतन टाटा ने कहा था कि एक गुड एम है तो दूसरा बैड एम... अब अमर सिंह कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी ने गुजरात को जलाया वो कैसे गुड एम हो सकते हैं....अमर सिंह का कहना है कि ममता बनर्जी ने पूरी उम्र गरीबों की लड़ाई लड़ी लिहाजा वो बैड एम कैसे हो सकती हैं... 
अमर सिंह के सवाल अपनी जगह जायज हो सकते हैं...उनका तर्क सही है...लेकिन क्या अमर सिंह से ये नहीं पूछा जा सकता की वो गुए ए हैं यै बैड ए... जो आदमी बटला हाउस मुठभेड़ के बाद इंस्पेक्टर एम सी शर्मा के घर जाता है...उनके परिजनों से संवेदना जताता है और आर्थिक मदद करता है...वही आदमी बटला हाउस पहुंचने पर मुठभेड़ को फ़र्ज़ी करार देता है...वही आदमी मुठभेड़ में शहीद एक इंस्पेक्टर पर हज़ार सवाल उठाता है आखिर वो क्या है.... ये वहीं अमर सिंह हैं जो सिमी पर प्रतिबंध के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं...क्या हम अमर सिंह से नहीं पूछ सकते हैं कि रतन टाटा से सवाल पूछने से पहले आप बतायें की आप क्या हैं गुड ए या बैड ए

Monday, 13 October 2008

कुतर्क को सलाम

इसे देसी भाषा में बरजोरी कहते हैं....कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी एस येदुरप्पा जो कह रहे हैं उसे और कुछ नहीं कहा जा सकता...भगवा बिग्रेड के सिपाही येदुरप्पा फरमाते हैं की कर्नाटक में फसाद की जड़ ईसाई संस्थाएं हीं हैं...उनकी माने तो अरसे से राज्य में हिंदू और ईसाई लोग मिलजुल कर रहते आएं हैं...लेकिन हाल फ़िलहाल कर्नटाक में जो हंगामा हुआ है उसके पीछे उन्ही उपद्रवी ईसाईयों का हाथ हैं...

महान येदुरप्पा जो तर्क देते हैं वो और भी काबीले गौर हैं...कर्नाटक के मुख्यमंत्री की माने तो ईसाई संगठन जबरन लोगों को धर्म परिवर्तन करा रहे हैं...यही नहीं ये संगठन हिंदू देवी देवताओं के बारे में आपत्तिजनक पुस्तिकाएं प्रकाशित कर रहे हैं...और कुल मिलाकर ये की इन ईसाई संगठनों के कुर्कमों को फल है कि कर्नाटक में इन पर हमला हो रहा है...
अब कोई येदुरप्पा से पूछे की आज तक उन्होंने कितने ईसाई संगठनों को राज्य में धर्म परिवर्तन कराते हुए पकड़ा है..कितने ईसाई धर्म प्रचारकों को कर्नाटक में गिरफ़्तार किया गया है...लोगों का धर्म परिवर्तन कराते हुए...येदुरप्पा मीडिया को बताएं की आखिर वो कौन सी संस्थाएं हैं जो हिंदू देवी देवताओं के संबंध में आपत्तिजनक पुस्तिकाएं प्रकाशित कर रही हैं...
आखिर क्या येदुरप्पा की जिम्मेदारी अल्पसंख्यक संगठनों पर आरोप लगा कर खत्म हो जाती है...कर्नाटक के मुख्यमंत्री हैं वो...राज्य की पूरी प्रशासनिक मशिनरी उनके पास हैं...क्यों नहीं दोषियों पर कार्रवाई होती है...ज्योतिष में भरोसा करनेवाले कर्नाटक के महान मुख्यमंत्री बतायेंगे की आखिर कब तक उनके राज्य में हिंसा फैलाने वालों को सज़ा मिल पायेगी...क्यों नहीं अपने उसी ज्योतिषि से पूछते हैं जिसने उन्हें नाम बदलने और उनके आदरणिय नेता के लाल कृष्ण आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने की भविष्यवाणी की थी...क्या अब अटल बिहारी वाजपेयी को दोबारा नरेंद्र मोदी की तरह येदुरप्पा को भी राजधर्म समझाना होगा....

Sunday, 12 October 2008

क्या दंगे चुनाव जीतने के औजार हैं ?

मध्यप्रदेश के दो शहर इंदौर और बुरहानपुर...अगर हम आपसे पूछे की इन दो शहरों में क्या समानता है तो आप कहेंगे की ये दोनों प्रदेश के दो शहर हैं...लेकिन नहीं ज़नाब...एक समानता और है...इन दो शहरों में दंगे हुए हैं...इंदौर में दो महीने पहले दंगे हुए तो बुरहानपुर में आज-कल में....आखिर आज हम इन दो शहरों और दंगों की बात क्यों कर रहे हैं...दरअस्ल मध्यप्रदेश में दिसंबर महीने में चुनाव होने हैं...क्या इन दंगों का संबंध चुनाव से हैं...क्या ये दंगे प्रदेश की मौजूदा सरकार को चुनाव जीताने में मदद कर सकते हैं..क्या दंगे चुनाव जीतने के औज़ार बन गए हैं...

विधानसभा चुनाव नजदीक हों और एक एक कर बीजेपी शासित राज्य के दो शहरों में दंगे हमें ये सोचने को मजबूर कर रहे हैं कि कहीं ये दंगे चुनावी फायदे के लिए तो नहीं करवाए जा रहे हैं....बात सुनने में अटपटी जरुर लग सकती है लेकिन हमें वर्ष 2002 की शुरूआत में गुजरात में हुए दंगों और उसके बाद बीजेपी की जबरदस्त जीत को नहीं नहीं भूलना चाहिए। ये भी कि उन्हीं दंगों के बाद गुजरात में विधानसभा चुनाव होने थे।
मध्यप्रदेश के बड़े शहर इंदौर में जुलाई के दूसरे सप्ताह दंगे हुए। उन दंगों के बाद मध्यप्रदेश के मंत्रियों ने ये कहा कि दंगे किसी दुर्घटना वश हुए थे। लेकिन राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग आयोग के अध्यक्ष मोहम्मद सफी कुरैशी और दूसरे सदस्यों ने दंगा पीड़ितों से बातचीत की और निष्कर्ष निकाला कि दंगा सुनियोजित ढंग से भड़काया गया था...इस दल ने इंदौर के खजराना, सिंधी कालोनी का भी दौरा किया जहां सबसे ज्यादा लोग हिंसा के शिकार हुए थे...इन दंगों में सात लोग मारे गए थे। इन दंगों में जानबूझकर एक खास समुदाय को निशाना बनाकर गोली चलाने के आरोप में तीन पुलिसकर्मियों को काफी दबाव में सस्पेंड भी करना पड़ा था।

उसके बाद जबलपुर में धर्म परिवर्तन के नाम पर ईसाई समुदाय को निशाना बनाया गया..और अब निशाने पर है बुरहनापुर...बुरहानपुर में भी ठीक वही हालात दुहराने की कोशिश की जा रही है। अब तक बुरहानपुर में दस लोग मारे जा चुके हैं। हालात काबू में होते नहीं दिख रहे हैं। अगर स्थिति पर जल्द नियंत्रण नहीं पाया जा सका तो कुछ और लोगों की बलि चढ़ सकती है।

दरअसल इन दंगों के पीछे जो लोग होते हैं वे काफी शातिर होते हैं। वे अपनी छोटी-छोटी कार्रवाई से अपने राजनीतिक आकाओं का हित साधते हैं। ये घटनाएं हमें कुछ सोचने को मजबूर करती हैं कि क्या वजह है कि जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आते हैं बीजेपी शासित राज्यों में दंगे भड़कने लगते हैं या अल्पसंख्यकों पर हमले शुरू हो जाते हैं। बीजेपी हमारी धार्मिक भावनाओं का शोषण करती है और हमें ही कुछ लोगों के खिलाफ खड़ी कर देती है। जब इन्हें सत्ता मिलती है तो ये किताबों और संस्थाओं के जरिए नन्हें बच्चों में एक खास समुदाय के खिलाफ ज़हर भरते हैं और फिर शुरू करते हैं राजनीति। सत्ता में आने के बाद इन्हें चुनावी वायदे भी याद नहीं रहते। मध्यप्रदेश में पिछले विधानसभा चुनावों के समय बीजेपी बिजली, सड़क और पानी के नाम पर सत्ता में आयी थी। लेकिन साढ़े चार साल तक मध्यप्रदेश के लोगों को न बिजली मिली न पानी। उपर से सड़कों की हालत भी खस्ता ही रही। ऐसे में ये पार्टी लोगों की भावनाओं को भुनाने के लिए क्या करे। लिहाजा उसे भरोसा रहा केवल दंगों और धार्मिक भावनाएं भड़काने पर।
तो क्या वाकई भारतीय राजनीति में दंगे चुनाव जीतने का औजार बन गए हैं...आपको क्या लगता है...?

Saturday, 11 October 2008

लोकनायक पर भारी महानायक

टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज़ की पट्टी कौंधती है..महानायक बीमार...महानायक को अस्पताल में भर्ती कराया गया...मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया...पेट दर्द की शिकायत के बाद अस्तापल में भर्ती कराया गया...ब्रेकिंग न्यूज़ बता रही थी कोई महानायक बीमार था..आज उस महानायक का 66 वां जन्मदिन भी था...उसके बाद क्या...अस्पताल के बाहर रिपोर्ट्स की भीड़ जुट गई...विजुअल्स में गोला बनाकर बताया जाने लगा की अस्पताल की किस मंजील पर किस रूम में महानायक भर्ती है... एक के बाद एक पूरे देश से महानायक की सलामती के लिए दुआओं की ख़बर आने लगी...ऐसा लग रहा था कि जैसे अगर इस महानायक को कुछ हो गया था पूरा देश तबाह और बर्बाद हो जाएगा...न्यूज़ चैनल्स के ज़रिए पूरे देश में माहौल शोकमय हो गया...चैनल्स को देखकर ऐसा लग रहा था कि आज राष्ट्रपिता बीमार हो गए हैं...अगर राष्ट्रपिता नहीं रहे तो क्या होगा हमारे महान देश का..हम सब अनाथ हो जायेंगे...
टीवी से सारी ख़बरे गायब हो गईं...न्यूज़ चैनल्स के पर्दे पर अगर कुछ था तो बस महानायक की महा गाथा...बताया जाने लगा की कैसे समय समय पर इस महानायक ने ऐसी बहुत सारी मुश्किलों का सामना किया है...महानायक के प्रशंसक देश भर में इबादत गाहों में पूजा अर्चना करने लगे..
आज टीवी ये नहीं बता रहा था कि कंधमाल में क्या हुआ...आज किसी को नहीं पता चला की परमाणु करार पर हस्ताक्षर के बाद क्या हुआ...आज किसी ने नहीं बताया की शुक्रवार को जब शेयर बाज़ार गिरकर बंद हुआ उसके बाद बाज़ार को सुधारने के लिए और क्या क्या कवायद हो रही है...आज तो सिर्फ महानायक की बीमारी ही इस देश की सबसे बड़ी ख़बर बन गई.. बाक़ी सारी ख़बरें दब गई..इन ख़बरों के साथ दब गया हमारा अतीत...हम आज ये भूल गए की इस महानायक से साथ ही एक लोकनायक का भी आज जन्म उत्सव था...साल में सिर्फ एक ही दिन तो हम उस लोकनायक को याद करते हैं...सिर्फ आज ही के दिन तो उसके आर्दशों, उसके संघर्ष और उसके सपनों की बात करते हैं..सिर्फ आज ही के दिन तो हम जानते हैं कि कैसे एक बूढ़े आदमी ने इस देश को बदलने के लिए अपने समय की सबसे ताकतवर महीला के ख़िलाफ़ लोकतांत्रिक तरीके से जंग का एलान किया था..कैसे एक 72 साल के आदमी ने लोकतंत्र को ज़िंदा रखने के लिए तानाशाही के ख़िलाफ़ मोर्चा लिया था...हम सब कुछ भूल गए...याद रहा तो सिर्फ महानायक का जन्मदिन और महानायक की बीमारी...
खैर शाम होते होते आखिर पता चल ही गया की महानायक अब स्वस्थ्य हैं और उनकी हालत ख़तरे से बाहर है...महानायक लीला खत्म हुई...पूरे दिन चली इस लीला ने बता किया की हम मानसिक रूप से कितने दिवालीया हो गए हैं...इस लीला ने ये बता दिया की आज का भारत वाकई बदल गया...उसके आर्दश और उद्देश्य बदल गए हैं...अब हम अपने उन नायकों को याद नहीं करते जिन्होंने सड़क पर उतर कर हमारे सुनहरे कल के लिए अपना आज बर्बाद कर दिया...हम तो सिर्फ उन महानायकों को याद करते हैं जिन्होंने फिल्मी पर्दे पर हमें सुनहरे सपने दिखाए और इसके एवज में वसूले गए पैसे से अपना आज सुनहरा बनाया...

Friday, 10 October 2008

आज एक नायक का जन्मदिवस है....

आज एक नायक का जन्मदिवस है...एक ऐसे नायक का जन्मदिवस हैं जिसने आम आदमी के लिए अपने जीवन का सबकुछ दांव पर लगा दिया..जिसने आम आदमी के अधिकारों की रक्षा के लिए संपूर्ण क्रांति का अह्वान किया था...
हम ज्यादा पुरानी बात नहीं करेंगे...12 जून 1975...एक कोर्ट एक प्रधानमंत्री का चुनाव गलत तरीकों का इस्तेमाल करने के आरोप में अयोग्य ठहराता है...उसका चुनाव रद्द कर दिया जाता है...चारो तरफ से इस्तीफ़े की मांग उठती है..लेकिन सत्ता में बने रहने के लिए वो प्रधानमंत्री अपने देश में 25 जून की रात को आपतकाल लगा देती है
ऐसे में 73 साल का एक बूढ़ा आदमी आम लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए उठ खड़ा होता है... वो देश में संपूर्ण क्रांति का आह्वान करता है...नौजवानों को एकजुट करने का बीड़ा उठाता है...सत्ता में बने रहने की लालसा में लिप्त लोग उस बूढ़े को क़ैद कर देते हैं...ख़राब तबियत के बाद भी उसे जेल में बंद रखा जाता है...एक शक्तिशाली प्रशासन को एक बूढ़े आदमी से ख़तरा था...क्योंकि वो बुजुर्ग अपनी लिए नहीं देश के करोड़ों लोगों और उनके अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ रहा होता है...ख़ैर ख़राब तबियत के कारण उस बूढ़े आदमी को छोड़ दिया जाता है...समय गुजरता है और आपातकाल खत्म होता है...चुनाव होते हैं और वही बुजुर्ग इस देश में परिवर्तन का प्रतिक बनता है...उसके बताए रास्तों पर चलकर लोग अपने समय की सबसे शक्तिशाली महिला को परास्त कर देते हैं...जनता बता देती है कि आखिर नायक कौन है....आज उसी नायक का जन्मदिन है...इस नायक ने समाज के शोषित,दलित और कमजोर लोगों के लिए सड़क पर संघर्ष किया...

आज एक और नायक का जन्मदिन है...एक ऐसे नायक का जन्मदिन जिसने लोगों को बड़े-बड़े ख्वाब दिखाए...इस नायक ने भी शोषित,दलित और कमजोर लोगों के लिए संघर्ष किया....लेकिन इन लोगों के लिए ये नायक कभी सड़क पर नहीं उतरा...इस नायक ने दबे-कुचले लोगों की आवाज बुलंद की..लेकिन कभी उनके दुख में शामिल नहीं हुआ...ये नायक हमेशा चकाचौंध में रहा...हमेशा लग्जरी गाड़ियों मे घूमा...हमेशा एसी की शीतल हवा उसके बग़ावत के सुरों को ठंडक पहुंचाती रही...हमेशा वो एसी की शितलता के तले बगावत की आग उगलता था...आज भी ये नायक हमारे बीच मौजूद है...आज भी ये नायक समाज के लिए बुढ़ापे की नई परिभाषा पेश करता है...आज भी ये अपने कुनबे के साथ अन फारगेटेबल टूर पे निकलता है तो लोगों की भीड़ जुटती है...खुद नाचता है...परियों समान अपनी बहू को नचाता है...पैसे कमता है...हां रील लाईफ में आम आदमी की आवाज़ उठाना नहीं भूलता....

आज किस नायक को याद करेंगे हम...शायद दूसरे वाले नायक को...क्योंकि वो हमारे बीच मौजूद है...उसपर चर्चा करने के लिए हमे किसी ख़ास रिसर्च की जरूरत नहीं है...पिछले साल का काफी मैटेरियल पड़ा होगा...उसी को उठा लेगें और चला देंगे...आखिर क्यों न धूम-धाम से याद करें हम सदी से अपने इस महानायक को....
लेकिन आज पहले नायक को भी याद किया जाएगा...उसकी विचारधारा को मानने का छलावा करने वाले जनप्रतिनिधि उसके फोटो पर फूल माला चढ़ायेंगे...जो आदमी पूरी उम्र व्यक्तिपूजा के ख़िलाफ़ रहा उसी की पूजा की जायेगी...उनके कदमकुआँ स्थित निवास स्थान पर पहुँचे कुछ सरकारी और ग़ैरसरकारी गणमान्य लोग उसके चित्र पर माल्यार्पण करेंगे.बस एक औपचारिकता निभा दी जायेगी ..लोग यहां आकर शीश नवाने की औपचारिकता में प्रचार सुख पायेंगे...इस नायक ने जिन बुराइयों यानी घूसखोरी, कालाबाज़ारी, मुनाफ़ाखोरी, जमाखोरी, अपराध और शासन के भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मुहिम चलाई थी अब उन बुराइयों के ख़िलाफ़ आवाज़ कोई नहीं उठायेगा....नायक के चेले उसके चित्र या मूर्ति पर पुष्पांजलि अर्पित करेंगे और उसके विचारों को तिलांजलि देने की रस्म अदा करेंगे
अब तय आपको करना है कि आप किस नायक का जन्मदिवस मनायेंगे... 
आपको शुभकामनाएं

Thursday, 9 October 2008

इस हफ्ते की टीआरपी 28 सितंबर से 4 अक्टूबर तक

इस हफ्ते की टीआरपी 28 सितंबर से 4 अक्टूबर तक 
नंबर चैनल प्रतिशत बदलाव
1. आज तक 17.3 -.5
2. इंडिया टीवी 17.00 -1.9
3. स्टार न्यूज़ 17.00 +2
4. ज़ी न्यूज़ 10 -2
5. आईबीएन 7 8.0
6. एनडीटीवी इंडिया 8.0
7. न्यूज़ 24 6.00
8. समय 6.00 +1
9. लाईव इंडिया 4 +1
10. तेज 4.  +1

स्रोत टैम 28 सितंबर से 4 अक्टूबर तक

Wednesday, 8 October 2008

अब अब नहीं चलेगा चुनावी भविष्यवाणी का खेल.....

भारत सरकार ने चुनाव ख़त्म होने से पहले एक्ज़िट पोल के प्रकाशन और प्रसारण पर रोक लगाने का फ़ैसला किया है ताकि इससे मतदाता प्रभावित न हों.....केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को इस फ़ैसले को मंज़ूरी दी...इसके लिए अब जनप्रतिनिधित्व क़ानून, 1951 में संशोधन किया जाएगा. संशोधन के लिए सरकार संसद में एक विधेयक लाएगी.
दो साल पहले चुनाव आयोग ने निष्पक्ष चुनाव का हवाला देते हुए चुनाव का अंतिम चरण पूरा होने से पहले एक्ज़िट पोल के नतीजों का प्रकाशन और प्रसारण पर रोक लगा दी थी.....लेकिन मीडिया कंपनियों की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने इस आदेश को ख़ारिज कर दिया था.


मतदाता प्रभावित न हो
लोकसभा और राज्य विधानसभा के चुनाव आमतौर पर कई चरणों में होते हैं.....अब तक मीडिया हर चरण में मतदान करके निकलने वाले मतदाताओं की राय के आधार पर चुनावी रुझानों का संकेत देते रहे हैं.....चुनाव ख़त्म होने से पहले एक्ज़िट पोल के नतीजों के प्रकाशन-प्रसारण पर रोक से मतदाताओं को यह अवसर मिलेगा कि वे चुनावी रूझानों से बिना प्रभावित हुए अपने मत का प्रयोग करें....सरकार का कहना है कि बीच चुनाव में एक्जिट पोल के प्रसारित होने से मतदाताओं पर इसका असर पड़ता है...मतदाता बग़ैर किसी मत से प्रभावित हुए मतदान करे इसके लिए एग्जिट पोल पर रोक लगाना जरूरी है...


कैसे होता है एग्जिट पोल
भारत में एग्जिट पोल करने वाली कंपनियां बताती है कि उनका तरीका वैज्ञानिक होता है...ये कंपनिया मतदान के समय चुनाव क्षेत्रों में अपने लोगों को भेजती हैं...ये लोग मतदान केंद्र के बाहर खड़े रहते हैं और जब मतदाता वोट डालकर बाहर आता है तो उससे एक प्राक्सी बैलेट पेपर पर वोटिंग करवाई जाती है...इस वोटिंग के परिणामों के आधार पर हीं बाकी परिणामों की भविष्यवाणी की जाती है...


क्या है कमियां
बेशक एग्जिट पोल करने वाली कंपनियां कहें की वो पोल के लिए साफ सुथरा तरीका अपनाती हैं लेकिन जहां मतदाताओं की संख्या करोड़ों में है वहां कुछ हज़ार वोटरों की राय जानने के बाद कैसे सभी परिमाणों की भविष्यवाणी की जा सकती है...दूसरी बात ये भी है कि भारत जैसे देश में जहां अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग फैक्टर काम करते हैं वहां कैसे एक या कुछ चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्रों में कुछ चुनिंदा मतदाताओं की राय के आधार पर सभी इलाक़ों के चुनाव परिणामों की भविष्यवाणी जा सकती है....भाषा, जाति और भौगोलिक स्थिति में अनगिनत विभिन्नताएं रखने वाले देश में, जहां मतदाताओं की संख्या करोड़ों में हो, एक्जिट-पोल करना आसान नहीं.सारे मतदाताओं का सर्वे करना नामुमकिन हैऔर अगर किया जाय तो यह और भी महंगा हो जाएगा.


एक्जिट पोल - एक बानगी
सन २००४ में जब लोकसभा चुनाव में पहले चरण का मतदान हुआ तो सभी न्यूज़ चैनल्स और समाचार पत्रों ने एग्जिट पोल चलाए...क्या कहते थे ये एग्जिट पोल हम आपको बताते हैं...
तेरह राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों की कुल 140 लोकसभा सीटों के लिए हुए पहले दौर के मतदान के बाद कई सर्वेक्षण हुए...मतदान के बाद एक्ज़िट पोल का सार-संक्षेप यह था कि एनडीए को 80 से 90 और कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को 45 से 55 तक सीटें मिल सकती हैं.
स्टार, एनडीटीवी, ज़ी, आजतक और सहारा जैसे प्रमुख टीवी चैनलों के इन सर्वेक्षणों में हालांकि कई मामलों में काफ़ी विरोधाभास थे लेकिन इतना तय था कि एनडीए गठबंधन कांग्रेस से काफ़ी आगे है.


उस समय के राज्यवर अनुमान
महाराष्ट्र में कुल 48 में से 24 सीटों के लिए मतदान हुआ, आजतक चैनल के सर्वेक्षण का कहना था कि यहाँ कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को 12 और भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को 11 सीटें मिलेंगी.
जबकि सहारा टीवी ने भाजपा वाले गठबंधन को 10 और कांग्रेस वाले गठबंधन को 13 सीटें मिलने की भविष्यवाणी की.
लेकिन इसी राज्य के बारे में ज़ी टीवी का कहना था कि यहाँ भाजपा-शिवसेना गठबंधन को 10 से 12 सीटें मिल सकती हैं, जबकि कांग्रेस वाले गठबंधन को 6-8 सीटें मिलेंगे.
गुजरात में जहाँ सभी 26 सीटों के लिए मतदान, आजतक चैनल का कहना था कि भाजपा वहाँ 23 तक सीटें जीत सकती है जबकि ज़ी न्यूज़ का मानना था कि वहाँ भाजपा को 18 से 20 तक सीटें मिलेंगी.
गुजरात की ही तरह, छत्तीसगढ़ में भी सभी 11 सीटों के लिए मतदान हुआ.स्टार टीवी के सर्वेक्षण का कहना था कि यहाँ भाजपा को 10 और कांग्रेस को एक सीट मिलेगी, जबकि सहारा टीवी ने कहा है कि भाजपा को सात और कांग्रेस को चार सीटें मिल सकती हैं.
बिहार की 40 में से 11 सीटों के बारे में आजतक का कहना था कि एनडीए गठबंधन को नौ सीटें मिल सकती हैं जबकि कांग्रेस वाले गठबंधन को दो सीटें, लेकिन सहारा का कहना था कि ये सीटें क्रमशः सात और चार हो सकती हैं.
झारखंड की ग्यारह सीटों में से छह के लिए मतदान हुआ. स्टार के मुताबिक़ दोनों गठबंधनों को तीन-तीन सीटें मिलेंगी, जबकि आजतक ने चार सीटों के साथ भाजपा वाले गठबंधन की बात कही.
आजतक के मुताबिक़ आंध्र प्रदेश में कांग्रेस का पलड़ा भारी दिख रहा था और उसे 21 में से 13 सीटें मिल सकती थी जबकि भाजपा-तेलुगू देशम को आठ, स्टार टीवी का आकलन भी यही था
असम की छह सीटों के लिए हुए मतदान के बारे में आजतक का मानना था कि भाजपा को चार और कांग्रेस को दो सीटें मिल सकती हैं, जबकि ज़ी टीवी ने भाजपा को यहाँ सिर्फ़ एक सीट मिलने की भविष्यवाणी की .
कर्नाटक के बारे में स्टार टीवी का कहना था कि 15 सीटों के लिए हुए मतदान में भाजपा का पलड़ा भारी है, उसे 10 और कांग्रेस को चार सीटें मिल सकती हैं लेकिन ज़ी टीवी ने यहाँ भाजपा को अधिकतम पाँच सीटें मिलने की भविष्यवाणी की.
सवाल ये हैं कि इन सभी पोल्स के जिनके बारे में दावा किया जाता है कि वे वैज्ञानिक तरीके से करवाए जाते हैं, उनके अनुमान एक दूसरे से पूरी तरह से भिन्न होते हैं.
लेकिन जब चुनाव परिणाम सामने आए तो हक़ीकत कुछ अलग थी...एग्जिट पोल बता रहे थे कि केंद्र में बीजेपी की सरकार बन रही थी लेकिन जब वोटों की गिनती हुई तो इन दावों की कलई खुल गई....


एग्जिट पोल से किसको है फायदा
टीवी चैनलों, समाचार पत्रों और पत्रिका प्रकाशित करने वाले वह समूह जो ज़ाहिर है कि इस एक्ज़िट पोल पर रोक नहीं चाहते, उनके लिए इन एक्ज़िट पोल मतलब बढ़ी हुई बिक्री और विज्ञापनों के माध्यम से ज्यादा पैसे बनाने का ज़रिया है.सर्वेक्षण कर रही हैं बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मार्केटिंग रिसर्ज एजेंसियाँ, जो सर्वे करने के नाम पर करोड़ों उगाह रही हैं उन्हें वोटरों की बौखलाहट से कोई लेना-देना नहीं है.

अब सरकार इन एग्जिट पोल्स पर रोक लगा रही है...जाहिर है चुनाव के मौसम में परिणामों की भविष्य वाणी कर दर्शकों को गुमराह करनेवाले चैनलों का कारोबार अब मंदा पड़ा जाएगा...दिसंबर में चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं...हिंदी बेल्ट के इन चार राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली में होनवाले चुनाव अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए सेमिफाइनल जैसा है...लेकिन अब एग्जिट पोल पर रोक से चुनावी चैनलों का कारोबार बंद होगा...उन लोगों को कारोबार भी बंद होगा जो सर्वेक्षण के नाम पर करोड़ो की उगाही करते थे और एसी कमरे में कंप्यूटर पर बैठक चुनाव परिणामों की भविष्यवाणी करते थेनहीं चलेगा चुनावी भविष्यवाणी का खेल.....