दिल्ली में बटला हाउस मुठभेड़ से जुड़े तथ्य
१. मुठभेड़ में दि्ल्ली पुलिस स्पेशल सेल के इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की मौत
२. मुठभेड़ में दो युवक अतिफ अमिन और मोहम्मद साजिद मारे गए
३. मुठभेड़ के बाद एक युवक मोहम्मद सैफ़ गिरफ़्तार
मुठभेड़ का समय
मुठभेड़ के समय को लेकर अलग-अलग समाचार पत्रों और चैनलों ने अलग अलग दावा किया...दैनिक जागरण बताता है कि मुठभेड़ ग्यारह बजे शुरू हुई तो इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक ये समय सुबह का नौ बजकर पैंतालिस मिनट था...हिंदुस्तान टाइम के मुताबिक दस बजकर तीस मिनट तो अमर उजाला के मुताबिक मुठभेड़ शुरू हुई दस बजकर पैंतालिस मिनट पर...न्यूज़ चैनलों का भी यही हाल है
कितानी देर चली मुठभेड़
हिंदुस्तान टाइम्स की माने तो मुठभेड़ पंद्रह मिनट चली...वहीं इसे हिंदी संस्करण दैनिक हिंदुस्तान का कहना है कि मुठभेड़ नब्बे मिनट चली...टाइम्स आफ इंडिया की माने तो मुठभेड़ पच्चीस मिनट में खत्म हो गई..वही मेल टु़डे बताता है कि मुठभेड़ तीस मिनट चली...वीर अर्जुन कहता है कि मुठभेड़ तीस से पैंतिस मिनट चली...वहीं राष्ट्रीय सहारा उर्दू की माने तो मुठभेड़ दो घंटे चली...अमर उजाला कहता है कि मुठभेड़ एक घंटा पंद्रह मिनट चली और पंजाब केसरी कहता है कि मुठभेड़ एक घंटा चली
कितनी राउंड गोली चली
टाइम्स आफ इंडिया के मुताबिक पच्चीस राउंड गोली पुलिस ने चलाई और आठ राउंड गोली आतंकियों ने चलाई...इंडियन एक्सप्रेस ,हिंदू,दैनिक हिंदुस्तान, पंजाब केसरी, राष्ट्रीय सहारा उर्दू बताते हैं कि पुलिस ने बाईस राउंड गोली चलाई..लेकिन ये सभी अख़बार आंतकियों की तरफ से की गई फायरिंग पर चुप हैं....राष्ट्रीय सहारा हिंदी और अमर उजाला बताते हैं कि पुलिस ने बाईस राउंड गोली चलाई और आतंकियों ने आठ राउंड गोली चलाई..नवभारत टाइम्स कहता है कि पुलिस और आतंकी दोनों के पास ए के ४७ था
घटनास्थल से क्या मिला
राष्ट्रीय सहार हिंदी बताता है कि घटनास्थल से पुलिस को एक एके ४७ दो .३२ बोर की पिस्टल, एक कंप्यूटर और किताबें मिली...पंजाब केसरी बताता है कि पुलिस को एक एके ४७,दो पिस्तौल औरएक कंप्यूटर मिला...अमर उजाला बताता है कि पुलिस को दो एक एक के ४७ .३० बोर की पिस्टल, दो लैपटाप, एक दर्जन मोबाइल, और छे पेन ड्राइव मिले...नवभारत टाइम्स कहता है कि पुलिस को एक के ४७.३० बोर की पिस्टल, दो लैपटाप और बीस जिंदा कारतूस मिले...दैनिक हिंदुस्तान बताता है कि एक एक के ४७ दो पिस्तौल और कुछ दस्तावेज मिले...वीर अर्जुन बताता है कि एक एक के ४७ .३० बोर की पिस्टल, ज़िंदा कारतूस और दसी कट्टे बरामद हुए...
घटना स्थल पर कितने पुलिसवाले मौजूद थे.
इंडियन एक्प्रेस बताता है कि शर्मा के साथ पांच और पुलिस वाले मौजूद थे...वीर अर्जुन की माने तो पचास पुलिस वाले मौजूद थे...नवभारत टाइम्स के मुताबिक कुल चौबिस पुलिस वाले घटनास्थल पर मौजूद थे...अमर उजाला कि रिपोर्ट कहती है कि बाइस पुलिस वाले वहां मौजूद थे...
मोहन चंद शर्मा को कितनी गोलियां लगी...
टाइम्स आफ इंडिया, इंडियन एक्प्रेस, मेल टुडे, हिंदू, वीर अर्जुन, राष्ट्रीय सहारा हिंदू के मुताबिक मोहन चंद शर्मा को तीन गोलियां लगी...नवभारत टाइम्स कहता है कि कुल चार गोलियां लगी..जनसत्ता का कहना है कि मोहन चंद शर्मा को कुल पांच गोलियां लगी..राष्ट्रीय सहारा उर्दू की माने तो कुल चार गोलियां मोहन चंद शर्मा को लगीं....अमर उजाला कहता है कि कुल चार गोलियां लगी...
और आखिर में पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि मोहन चंद शर्मा को कुल दो गोली लगी थी
मोहन चंद शर्मा के बार में क्या कहते हैं अख़बार
हिंदुस्तान टाइम्स बताता है कि शर्मा ने ७५ अपराधियों को मार गिराया था...टाइम्स आफ इंडिया कहता है कि ३५ आतंकियों और ८० अपराधियो को मारा था मोहन चंद शर्मा ने...इंडियन एक्प्रेस का आंकडा ७५ अपराधियों और ३५ आतंकियों का है...अमर उजाला की माने तो ३५ आतंकी और ४० गैंगस्टर को मारा था मोहन चंद शर्मा ने....
हमने आपके सामने सारे तथ्य रखे...ये वो तथ्य हैं जो दिल्ली पत्रकार संघ ने बटला हाउस मुठभेड़ पर तैयार की गई अपनी रिपोर्ट में पेश किया है...अगर इन तथ्यों को ध्यान से देखें तो पता चलता है कि इस घटना की रिपोर्टिंग में हमारे पत्रकारों और अख़बारों ने कितना घालमेल किया...ये घटना राजधानी दिल्ली की है..यहीं से सारे अखबार छपते हैं और सारे न्यूज़ चैनल्स चलते हैं...अगर दिल्ली की घटना से जुड़े तथ्यों में इस कदर घालमेल है तो आप खुद अंदाज़ा सकते हैं कि दूर-दराज से आने वाली रिपोर्ट्स में आपको कितनी सच्ची जानकारी मिल पाती है...
Tuesday, 7 October 2008
Monday, 6 October 2008
क्या मुसलमान होना गुनाह है?
दिल्ली धमाकों से पहले इमाम बुखारी ने अपनी तकरीर में कहा था कि इस मुल्क में मुसलमान होना एक गुनाह बन गया है...मुसलमानों को आंतकवाद से जोड़कर पेश किया जा रहा है...पुलिस और जांच एजेंसियां जानिबदारी से काम ले रही हैं...उस वक्त मुझे लगा की क्या बकवास है..भला मुसलमान होना गुनाह कैसे हो सकता है...कुछ मुसलमान अगर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल पाए भी जाते हैं तो पूरी कौम का इससे क्या लेना देना...और रही पुलिस और जांच एजेंसियों की बात तो वो अपना काम कर रही हैं...शक करने की कौन सी बात है...लेकिन दिल्ली में हुए ब्लास्ट उसके बाद बटला हाउस एनकाउंटर के बाद हालात एक दम से बदले बदले लग रहे हैं...
आज ऐसा लग रहा है जैसे आंतकवाद के नाम पर समाज के एक हिस्से को अलग-थलग कर दिया गया है...मुसलमानों को ये एहसास दिलाया जा रहा है कि वो आंतकवाद से ताल्लुक रखते हैं...दिल्ली ब्लास्ट और बटला हाउस मामले में पुलिस और मीडिया ने अपनी भूमिका को जिम्मेदारी से नहीं निभाया...मुसलमानों को शक की नज़र से देखा जा रहा है...कुछ लोगो सीधे-सीधे शक कर रहे हैं तो कुछ घुमा-फिरा कर कह रहे हैं की
तुम आंतकवादी हो...
मैंने पांच साल जामिया मिल्लिया इस्मालिया में शिक्षा पाई...पेशे से पत्रकार हूं..और दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक समाचार पत्र में काम करता हूं...नाम कुछ में रख लिजिए धर्म में इस्लाम को मानता हूं और सच्चा मुसलान हूं...बटला हाउस के पास ही रहता हूं...एनकाउंटर के बाद पूरे इलाक़े में डर और दहशत का आलम है...पूरे ओखला इलाक़े में हालात कश्मीर से भी गए गुजरे हैं...इस इलाक़े में ज्यादातर आबादी उन लोगों की है जो बाहर से आए हैं..किरायेदार वो हैं जो जामिया में पढ़ने आए हैं...अपनों से दूर दिल्ली में भविष्य बनाने आए इन छात्रों में अजीब सा डर है...हर युवा ये सोचता है कि पता नहीं कब उसे आतंकी घोषित कर दिया जाए...अदालत के फ़ैसले के बग़ैर कब पुलिस उसे दोषी ठहराकर उसका एनकाउंटर कर दे..हर आदमी एक दूसरे को शक की निगाह से देख रहा है...
इन हालात के बीच मुसलमान ये सोचने को मजबूर है कि आखिर क्यों इस मुल्क में उसे शक की निगाह से देखा जा रहा है...आंतकवाद को न तो मुलसमान समर्थन कर रहे हैं न ही वो अपराधियों को सज़ा देने के ख़िलाफ़ हैं..फिर क्यों बार बार उनकी देशभक्ति को शक की निगाह से देखा जा रहा है...आज सोचता हूं की इमाम बुखारी की तकरीर आम मुसलमान की तकरीर बन गई है...क्या वाकई इस देश में मुसलमान होना गुनाह हो गया है...
(ये लेख एक पत्रकार बंधु ने लिखा है...नाम नहीं छापने की शर्त पर...दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अख़बर में रिपोर्टर हैं)
आज ऐसा लग रहा है जैसे आंतकवाद के नाम पर समाज के एक हिस्से को अलग-थलग कर दिया गया है...मुसलमानों को ये एहसास दिलाया जा रहा है कि वो आंतकवाद से ताल्लुक रखते हैं...दिल्ली ब्लास्ट और बटला हाउस मामले में पुलिस और मीडिया ने अपनी भूमिका को जिम्मेदारी से नहीं निभाया...मुसलमानों को शक की नज़र से देखा जा रहा है...कुछ लोगो सीधे-सीधे शक कर रहे हैं तो कुछ घुमा-फिरा कर कह रहे हैं की
तुम आंतकवादी हो...
मैंने पांच साल जामिया मिल्लिया इस्मालिया में शिक्षा पाई...पेशे से पत्रकार हूं..और दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक समाचार पत्र में काम करता हूं...नाम कुछ में रख लिजिए धर्म में इस्लाम को मानता हूं और सच्चा मुसलान हूं...बटला हाउस के पास ही रहता हूं...एनकाउंटर के बाद पूरे इलाक़े में डर और दहशत का आलम है...पूरे ओखला इलाक़े में हालात कश्मीर से भी गए गुजरे हैं...इस इलाक़े में ज्यादातर आबादी उन लोगों की है जो बाहर से आए हैं..किरायेदार वो हैं जो जामिया में पढ़ने आए हैं...अपनों से दूर दिल्ली में भविष्य बनाने आए इन छात्रों में अजीब सा डर है...हर युवा ये सोचता है कि पता नहीं कब उसे आतंकी घोषित कर दिया जाए...अदालत के फ़ैसले के बग़ैर कब पुलिस उसे दोषी ठहराकर उसका एनकाउंटर कर दे..हर आदमी एक दूसरे को शक की निगाह से देख रहा है...
इन हालात के बीच मुसलमान ये सोचने को मजबूर है कि आखिर क्यों इस मुल्क में उसे शक की निगाह से देखा जा रहा है...आंतकवाद को न तो मुलसमान समर्थन कर रहे हैं न ही वो अपराधियों को सज़ा देने के ख़िलाफ़ हैं..फिर क्यों बार बार उनकी देशभक्ति को शक की निगाह से देखा जा रहा है...आज सोचता हूं की इमाम बुखारी की तकरीर आम मुसलमान की तकरीर बन गई है...क्या वाकई इस देश में मुसलमान होना गुनाह हो गया है...
(ये लेख एक पत्रकार बंधु ने लिखा है...नाम नहीं छापने की शर्त पर...दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अख़बर में रिपोर्टर हैं)
Friday, 3 October 2008
ख़बरों का अर्धसत्य ?
समाचार चैनल पर चलती है ब्रेकिंग न्यूज़....सांसद की पिटाई...मध्यप्रदेश के सांसद की पिटाई...सांसद वीरेंद्र कुमार की पिटाई...सागर से सांसद हैं वीरेंद्र कुमार...आरपीएफ,जीआरपी जवानों ने की पिटाई...इस ब्रेकिंग के थोड़ी ही देर बाद शाट्स चलते हैं..खून से सने सांसद वीरेंद्र कुमार...समाचार वाचक चिल्ला-चिल्ला के बता रहा है कि कैसे जवानों ने सांसद महोदय की धुनाई कर दी...विजुअल्स को इस तरह से एडिट किया गया है कि खून,भीड़ और हंगामा पूरे स्क्रीन पर दिखे...अब जाकर जमा है मजमा...लोकतांत्रिक देश में जनता का प्रतिनिधि सांसद पीट गया..देखिए खून से सने हैं सांसद महोदय...आरपीएफ और जीआरपी के जवानो ने कितनी बेदर्दी से मारा है....चूकी देखने में फुटेज या कहें शाट्स जानदार हैं इसलिए इस ख़बर को तान दिया जाता है...बार बार दिखाया जाता है...फुटेज में गोला बनाकर दिखाया जाता है....हम सब देखते हैं और मान लेते हैं कि इस महान लोकतंत्र में एक जनप्रतिनिधि पीट गया...प्रशासन ने उसे पीटा...आखिर क्यों पीट गया हमारा प्रतिनिधि...और पूरी ख़बर क्या है...क्या जो ख़बर दिखाई जा रही है उसमें कुछ लोचा है...
अब हम आपको इस ख़बर को पूरी हक़ीकत बताते हैं...दरअस्ल सागर के सांसद हैं वीरेंद्र कुमार...सागर के पास बीना में एक जगह है छोटी बज़रिया...यहां रेलवे की ज़मीन पर कुछ लोगों ने सालों से अवैध कब्ज़ा कर रखा था...बार-बार चेतावनी देने के बाद भी जब कब्ज़ा खाली नहीं हुआ तो रेलवे में अवैध कब्ज़े को मुक्त कराने के लिए अभियान चलाता...बक़ायदा कब्जा कर दुकान लगाए बैठे लोगों को नोटिस भेजा गया और जगह खाली करने की चेतावनी दी गई...तय समय तक कब्जा नहीं छोड़ने वाले लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू हुई...सब कुछ जवानों की मौजूदगी में शांति से चल रहा था..इतने में किसी गुर्गे ने नेताजी को ख़बर कर दी...मैदान तैयार है...जनता के हित की बात है...लोगों पर जुल्म हो रहा है .लिहाजा नेताजी चले आए...आते के साथ ही अधिकारी पर पील पड़े...जैसा की ऐसे मौक़ों पर होता है बातचीत की शुरुआत गाली से हुई...नेताज़ी ने अफसरों को जमकर गलियाया...नेताजी का हौसला देख समर्थकों को भी जोश आ गया..गाली से बात नहीं बनी तो पत्थर बाज़ी शुरू हो गई...सुरक्षाकर्मी घायल हुए...जब बेइज्जती की इंतहा हो गई और भीड़ बेकाबू हो गई तो जीआरपी और आऱपीएफ के जवानों ने कार्रवाई शुरू की...हर बार ऐसे मौक़ों पर हमारे नेतागण अंतरध्यान हो जाते हैं...लेकिन पता नहीं क्यों यहां वीरेंद्र कुमार क्यों फंस गए...लाठी चली तो बीच में आ गए..जब बीच में आ गए तो चोट भी लग गई...फुटेज में साफ दिख रहा है कि कुछ जवानों ने नेताजी को बचाने की कोशिश भी की..लेकिन नेताजी को चोट लगी और खून निकला...बस क्या था..खबरिया चैनलों को दमदार ख़बर हाथ लग गई...फ्रेम में भीड़, हंगामा और खून..इससे बेहतर ख़बर और क्या हो सकती थी...सब जुट गए ख़बर को तानने में...
किसी ने ये जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर पूरा वाक्या क्या था...सागर से जो पूरी फीड़ आई थी उसे नहीं देखा गया..नेताजी की बदसलूकी को किसी ने हाईलाइट नहीं किया...बस एक लाइन को पंचलाइन बनाया गया की सांसद की पिटाई..
ये तो सिर्फ एक घटना की बानगी भर है...पता नहीं ऐसी कितनी ख़बरें होती हैं जो हम तक इसी तरह आधी अधूरी पहुंचाई जाती है...हम इस अर्धसत्य को ही सत्य मानने को मजबूर होते हैं...क्योंकि दिल्ली में बैठे आदमी को क्या पता की बीना में आखिर हुआ क्या...लेकिन जीनको पता है..क्या ये उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती की वो पूरा सच दिखाए...क्या लोगों को आधी-अधूरी ख़बर दिखा कर हम उन्हें बरगला नहीं रहे हैं.
.क्या सांसद महोदय का पिटना ही ख़बर थी...क्या हमें ये नहीं देखने चाहिए की हमारा एक जनप्रतिनिधि क्यों उन लोगों की मदद कर रहा है जो गलत हैं...क्या रेलवे को कब्जा की गई ज़मीन को वापस लेने का अधिकार नहीं है...औऱ आखिर में ये सवाल की अगर सांसद महोदय की ज़मीन पर किसी ने कब्जा किया होता तो क्या तब भी सांसद महोदय उसके पक्ष में सड़क पर उतरते और लाठी खाते...
खैर सांसद महोदय ने जो किया वो किया...हमारी शिकायत तो उन न्यूज़ चैनलों से है जो जिन्होंने आधी-अधूरी ख़बर दिखाकर लोगों को बरगलाने की कोशिश की..क्या पत्रकारों की ये जिम्मेदारी नहीं बनती की वो पूरा सच दिखाते और बाकी दर्शकों पर छोड़ते की आखिर गलत है क्यों...कब्जा करने वाले...उनका समर्थन करनेवाले सांसद...या कब्जे को खाली करनवाले की कोशिश में जुटे रेलवे अधिकारी...
आप भी सोचिए की आखिर गलत है कौन...कब्जा करने वाले...उनका समर्थन करनेवाले सांसद...या कब्जे को खाली करनवाले की कोशिश में जुटे रेलवे अधिकारी...या ख़बर को आधे-आधूरे तरीके से पेश करने वाले पत्रकार
अब हम आपको इस ख़बर को पूरी हक़ीकत बताते हैं...दरअस्ल सागर के सांसद हैं वीरेंद्र कुमार...सागर के पास बीना में एक जगह है छोटी बज़रिया...यहां रेलवे की ज़मीन पर कुछ लोगों ने सालों से अवैध कब्ज़ा कर रखा था...बार-बार चेतावनी देने के बाद भी जब कब्ज़ा खाली नहीं हुआ तो रेलवे में अवैध कब्ज़े को मुक्त कराने के लिए अभियान चलाता...बक़ायदा कब्जा कर दुकान लगाए बैठे लोगों को नोटिस भेजा गया और जगह खाली करने की चेतावनी दी गई...तय समय तक कब्जा नहीं छोड़ने वाले लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू हुई...सब कुछ जवानों की मौजूदगी में शांति से चल रहा था..इतने में किसी गुर्गे ने नेताजी को ख़बर कर दी...मैदान तैयार है...जनता के हित की बात है...लोगों पर जुल्म हो रहा है .लिहाजा नेताजी चले आए...आते के साथ ही अधिकारी पर पील पड़े...जैसा की ऐसे मौक़ों पर होता है बातचीत की शुरुआत गाली से हुई...नेताज़ी ने अफसरों को जमकर गलियाया...नेताजी का हौसला देख समर्थकों को भी जोश आ गया..गाली से बात नहीं बनी तो पत्थर बाज़ी शुरू हो गई...सुरक्षाकर्मी घायल हुए...जब बेइज्जती की इंतहा हो गई और भीड़ बेकाबू हो गई तो जीआरपी और आऱपीएफ के जवानों ने कार्रवाई शुरू की...हर बार ऐसे मौक़ों पर हमारे नेतागण अंतरध्यान हो जाते हैं...लेकिन पता नहीं क्यों यहां वीरेंद्र कुमार क्यों फंस गए...लाठी चली तो बीच में आ गए..जब बीच में आ गए तो चोट भी लग गई...फुटेज में साफ दिख रहा है कि कुछ जवानों ने नेताजी को बचाने की कोशिश भी की..लेकिन नेताजी को चोट लगी और खून निकला...बस क्या था..खबरिया चैनलों को दमदार ख़बर हाथ लग गई...फ्रेम में भीड़, हंगामा और खून..इससे बेहतर ख़बर और क्या हो सकती थी...सब जुट गए ख़बर को तानने में...
किसी ने ये जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर पूरा वाक्या क्या था...सागर से जो पूरी फीड़ आई थी उसे नहीं देखा गया..नेताजी की बदसलूकी को किसी ने हाईलाइट नहीं किया...बस एक लाइन को पंचलाइन बनाया गया की सांसद की पिटाई..
ये तो सिर्फ एक घटना की बानगी भर है...पता नहीं ऐसी कितनी ख़बरें होती हैं जो हम तक इसी तरह आधी अधूरी पहुंचाई जाती है...हम इस अर्धसत्य को ही सत्य मानने को मजबूर होते हैं...क्योंकि दिल्ली में बैठे आदमी को क्या पता की बीना में आखिर हुआ क्या...लेकिन जीनको पता है..क्या ये उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती की वो पूरा सच दिखाए...क्या लोगों को आधी-अधूरी ख़बर दिखा कर हम उन्हें बरगला नहीं रहे हैं.
.क्या सांसद महोदय का पिटना ही ख़बर थी...क्या हमें ये नहीं देखने चाहिए की हमारा एक जनप्रतिनिधि क्यों उन लोगों की मदद कर रहा है जो गलत हैं...क्या रेलवे को कब्जा की गई ज़मीन को वापस लेने का अधिकार नहीं है...औऱ आखिर में ये सवाल की अगर सांसद महोदय की ज़मीन पर किसी ने कब्जा किया होता तो क्या तब भी सांसद महोदय उसके पक्ष में सड़क पर उतरते और लाठी खाते...
खैर सांसद महोदय ने जो किया वो किया...हमारी शिकायत तो उन न्यूज़ चैनलों से है जो जिन्होंने आधी-अधूरी ख़बर दिखाकर लोगों को बरगलाने की कोशिश की..क्या पत्रकारों की ये जिम्मेदारी नहीं बनती की वो पूरा सच दिखाते और बाकी दर्शकों पर छोड़ते की आखिर गलत है क्यों...कब्जा करने वाले...उनका समर्थन करनेवाले सांसद...या कब्जे को खाली करनवाले की कोशिश में जुटे रेलवे अधिकारी...
आप भी सोचिए की आखिर गलत है कौन...कब्जा करने वाले...उनका समर्थन करनेवाले सांसद...या कब्जे को खाली करनवाले की कोशिश में जुटे रेलवे अधिकारी...या ख़बर को आधे-आधूरे तरीके से पेश करने वाले पत्रकार
Thursday, 2 October 2008
ख़बरिया चैनलों से गायब होती ख़बर ?
जब अपने देश में टीवी चैनल के नाम पर केवल सरकारी चैनल दूरदर्शन हुआ करत था उस वक्त इसके प्राइम टाइम पर ख़बरों का नियत समय शाम आठ बजकर चालीस मिनट था...समय आगे बढ़ा और उसके बाद दर्जनों ख़बरिया चैनल आए लेकिन काफी दिनों तक उनके प्राइम टाइम में कोई बदलाव नहीं आया...यानी प्राइम टाइम पर ख़बर दिखाने का सिलसिला जारी रहा...ख़बरिया चैनल्स में प्राइम टाइम शाम आठ बज़े से लेकर रात दस बजे तक माना जाता है...थोड़ा हेरफेर कर प्राइम टाइम को शाम सात बजे से रात के ग्यारह बजे तक खिंचा जा सकता है...समाचार की दुनिया में बड़ी-बड़ी ख़बरे अपने पूर्ण रूप में प्राइम टाइम में ही न्यूज़ चैनल्स पर देखने को मिलती थी..इस पूरे चार घंटे के स्लाट में आज कुछ समय तक ख़बरों का बोलबाला रहता है...लेकिन उसके बाद जो होता है उसे देखकर फर्क करना मुश्किल होता है कि ये चैनल समाचार चैनल हैं या मनोरंजन चैनल... शाम का ये समय सिर्फ न्यूज़ चैनल्स के लिए ही नहीं मनोरंजन चैनलों के लिए भी प्राइम टाइम कहलाता है...ये मनोरंजन चैनल भी टीवी देखने वाले लोगों सीधे सीधे कहें तो दर्शकों को लुभाने के लिए ख़ास कार्यक्रम इसी समय पेश करते हैं...और यहां से शुरू होता है दर्शकों को रिझाने का खेल... जब से समाचार चैनलों के कर्ताधर्ताओं को अपने उपर भरोसा कम होने लगा अपने कंटेन्ट से विश्वास उठ गया तभी से प्राइम टाइम पर ख़बरों की जगह ले ली मनोरंजन चैनलों के कार्यक्रमों ने...अब धीरे-धीरे प्राइम टाइम पर ख़बरे कम होती गई और मनोरंजन चैनलों पर दिखाए जाने वाले डांस और हास्य के कार्यक्रमों की क्लिप्स ने समाचार चैनलों पर जगह बनानी शुरू कर दी...इन कार्यक्रमों में मनोरंजन के नाम पर जमकर फूहड़ता परोसी जाती है..न्यूज़ देखने वाले गंभीर दर्शकों को अब समाचार चैनलों के जरिए ये भोंडे कार्यक्रम परोसे जाने लगे हैं....
अब सवाल ये उठता है कि अगर न्यूज़ चैनल मनोरंजन के कार्यक्रम दिखा रहे हैं तो फिर इन्हें क्यों न्यूज़ चैनल कहा जाए...आखिर वजह क्या है प्राइम टाइम में ख़बरों के गायब होने का.. दरअस्ल सारा मामला फिर वहीं टीआरपी पर आकर टिकता है...जब से न्यूज़ चैनलों में कमजोर लोगों के हाथों में कमान दी जाने लगी है..ऐसे लोगों को चैनलों के अंदर महत्व दिया जाने लगा है जो शायद पुराने लोगों की तरह काबिल नहीं हैं तब से ख़बरों पर गाज गिरनी शुरू हो गई है....अब कामयाबी का सबसे बड़ा शार्टकॅट है कि किसी भी मनोरंजन चैनल के कार्यक्रम की फीड काट लो औऱ दर्शकों को तनाव दूर करने की दवा बताकर उसे परोस दो...आपके पास कुछ करने के लिए भी नहीं रह जाएगा और इस तरह आपकी पोल भी नहीं खुलेगी... दरअस्ल जब ये न्यूज चैनल सूचना और प्रसारण मंत्रालय के पास जाते हैं तो कहते हैं कि हमें लाइसेंस चाहिए एक चौबिस घंटे न्यूज़ चैनल का..लेकिन लाइसेंस मिलने के बाद जब चैनल लांच होता है तो चौबिस घंटे में से सिर्फ दस से बारह घंटे हीं समाचार को मिल पाता है बाकी का समय चला जाता है मनोरंजन चैनलों के कार्यक्रम के पास...लांचिग से पहले जो लोग दावा खालिस न्यूज़ चैनल का होता है लेकिन जब चैनल सामने आता है तो वही अधकचरा मिक्स न्यूज़ और मनोरंजन का....सवाल ये उठता है कि क्या आम आदमी से जुड़ी ख़बरों में इतना दम नहीं की वो दर्शकों को न्यूज़ चैनल तक खिंच कर लाए...क्या वाकई में न्यूज चैनलों को लोकप्रिय होने के लिए मनोरंजन दिखाने की जरूरत नहीं...शायद नहीं.... दरअस्ल खालिस न्यूज़ चैनल बनना ही आज के समाचार चैनलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है...ये एक ऐसी चुनौती ही जिससे इक्का-दुक्का न्यूज़ चैनल ही दो-चार होना चाहते हैं....लेकिन ये भी एक सच्चाई है कि अच्छी चीज बनाने के लिए हमेशा ही जी-तोड़ मेहनत करने और पक्के इरादे की जरूरत होती है
Wednesday, 1 October 2008
इस हफ्ते की टीआरपी 21 से 27 सितंबर तक
नंबर चैनल प्रतिशत
1. इंडिया टीवी 19.26
2. आज तक 18.19
3. स्टार न्यूज़ 15.54
4. ज़ी न्यूज़ 12.35
5. आईबीएन 7 8.63
6. एनडीटीवी इंडिया 8.23
7. न्यूज़ 24 5.87
8. समय 5.58
9. लाईव इंडिया 3.45
10. डी डी न्यूज़ 2.92
स्रोत टैम 21 से 27 सितंबर तक
डूबता संसेक्स, मरता निवेशक ?
हर बात में अमेरिकी की तरफ देखनेवाले हमारे आधुनिक देश ने लगता है इस आर्थिक मंदी के दौर में भी अमेरिका हो हीं देखा है...अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मंदी है लिहाजा हमारा महान देश भी आर्थिक मंदी के जद में आ गया है...पिछले हफ़्ते तक सोमवार से शुक्रवार तक हर दिन लागातार बग़ैर रूके शेयर बाज़ार का हमारा सांड बैठे जा रहा था..पिछले कुछ दिनों में बाज़ार यहां मतलब शेयर बाज़ार से है...तकरीबन तीन हज़ार प्वाइंट गिर चुका है...रोज़ ब रोज़ हो रही इस गिरावट में निवेशकों का अरबों रुपया स्वाहा हो गया... गिरती हुई मार्केट कुछ लोगों के लिए जानवेला साबित हुई...मध्यप्रदेश के इंदौर में दो और आंध्रप्रदेश के हैदराबाद में एक परिवार के चार लोगों ने कुल मिलाकर छे लोगों ने खुदकुशी कर ली...वजह सेंसेक्स में रोज़ हो रही गिरवाट के कारण हो रहा नुकसान....सवाल ये उठता है कि आखिर लोग अपनी जान क्यों दे रहे हैं.. रोज़ सुबह बिजनेस न्यूज़ चैनल्स पर आने वाले विशेषग्यों की माने तो हमारे देश में हालात अमेरिका जैसे बिगड़े नहीं है..ये विशेषग्य बताते हैं कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था दुरुस्त है और डरने की कोई बात नहीं है..लेकिन आखिर क्यों ऐसा हो रहा है कि संसेक्स लुढ़क रहा है और लोग अपनी जान दे रहे हैं.. क्या हमारा देश अमेरिका नाम के उस देश से वाकई इस क़दर नाभिनालबद्ध है कि वहां छिंक भी आती है तो हमें बुखार हो जाता है...क्या हमारी कोई अलग पहचान नहीं है...कहां हम दंभ भरते हैं कि हम अब एक महाशक्ति हो गए है..अगर इस दावे में थोड़ी भी सच्चाई है तो क्यों हम अमेरिका को छिंका आने पर बुखार से ग्रसित हो जाते है..आखिर क्यों एक आम निवेशक का पैसा हलाल स्ट्रीट में डूब रहा है... अब सवाल उन लोगों से जो शेयर बाजा़र में पैसा लगाते हैं...हम सभी जानते हैं कि सभी व्यापार कुछ विषेशयग्यता मांगते हैं..शेयर बाज़ार एक काफी पेंचिदा डगर है...उस रास्ते पर जो भी चलना चाहता है उसे वहां की तकनीकी जानकारी से लैस होना चाहिए...बाज़ार में रोज उठा पटक होती है..कोई माई का लाल पक्के तौर पर ये नहीं बता सकता है कि मार्केट कब कितना चढ़ेगा और कब कितना गिरेगा...फिर इस संकट को जानने के बाद भी आम निवेशक बाज़ार में पैसा कूटने का मोह लिए अपनी जमा पूंजी को दांव पर क्यों लगाता है... जब बाजा़र उपर की तरफ सरपट दौड़ लगा रहा होता है तो हर वो आदमी जीसने गलती से सही शेयरों में पैसा लगाया होता है खुद को शेयर बाज़ार का बाजीगर घोषित कर देता है...जश्न का दौर चलता है... और टीवी पर अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश की जाती है..लोग बताते हैं कि कैसे उन्होंने हज़ारों लगाए और लाखों बनाए..लेकन जब मार्केट औंधे मुंह गिरता है तो न्यूज़ चैनल्स पर ख़बर आती है कि फलां जगह फलां आदमी ने जान दी...आखिर पैसा बनाने के लिए इतनी बेसब्री क्यों... मैं सिर्फ इतना जानना चाहता हूं की जब हमें शेयर बाज़ार से जुड़ी बुनियादी चीजों का ग्यान नहीं है तो हम शेयर बाज़ार में पैसा लगाते हीं क्यों है..जब सबकुछ हमारे मुताबिक चल रहा होता है तो हम कहते हैं कि हमारा ग्यान सबसे महान लेकिन जैसे ही तस्वीर बदलती है हम जान देने पर उतारू हो जाते हैं....आखिर माजरा क्या है... जब हम पैसा बना रहे होते हैं तो कहते हैं कि ये हमारा हुनर है..लेकिन जब हम पिटने लगते हैं तो कहते हैं कि सरकार हमें बचाएं..क्यों हम सरकार से उम्मीद बांधते हैं कि वो हमें बचाने आए...और इन सब बातों से अगल अहम सवाल ये की हर मुश्किल घड़ी में हमें जान देने की ही क्यों सूझती है...हमारा मानस कब इतना बड़ा होगा की हम बुरी परिस्थियों के सामने डटकर खड़ा होने की सोचेंगे...कब हमारे अंदर वैग्यानिक सोच पैदा होगी की हार कर जान देने के बजाए लड़कर जीतना हमारा मकसद होना चाहिए...आखिर हम ये क्यों नहीं सोचते की हमारे जाने के बाद उन लोगों का क्या होगा जो हमारे सबसे करीबी बेहद अपने हैं...क्या बिगाड़ा है उन लोगों ने हमारा की हम जीते जी उनका जीवन नरक कर जाते हैं...
दर्शकों को बेवकूफ क्यों बनाया ?
बात थोड़ी पुरानी है..लेकिन संदर्भ आज का ही है....भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने देश के दो न्यूज़ चैनलों को नोटिस थमाया है..मामला है हाल में ही हुए महाप्रयोग के दौरान इन चैनलों की रिपोर्ट्स...जीन दो महान न्यूज़ चैनलों को नोटिस थमाया गया है वे हैं सबसे तेज "आज तक" और बदलते भारत की तस्वीर "इंडिया टीवी"
अगर टीआरपी रेटिंग्स के हिसाब से देखे तो समाचार देखने वाले कुल दर्शकों में से लगभग पैंतीस फ़ीसदी लोग इन दो चैनलों को देखते हैं...ये वही दोनों चैनल हैं जो अरसे से लोकप्रियता के मामले में नंबर एक और नंबर दो की कुर्सी पर विराजमान है..पूरी दुनिया जानती थी की जो महाप्रयोग हो रहा है वो साइंसटिफिक है और उससे किसी तरह का नुकसान होने की आशंका बहुत कम है..क्योंकि इस प्रयोग के पीछे साइंसदानों की एक लंबी फौज काम कर रही थी..बेहद जांच परख कर हर कदम उठाया जा रहा था..लेकिन हमारे देश के इन दो चैनलों की उन दिनों की रिपोर्ट्स को मानते तो बस धरती पर जलजला आने वाला था...सब कुछ खत्म होने वाला था.. देश में समाचार देखने वाले दर्शकों को आम तौर पर गंभीर माना जाना जाता...हम सभी जानते हैं कि हमारे देश में सूचना के लिए आम आदमी अख़बार और समाचार चैनलों पर निर्भर करता है...हम सभी अपने सामान्य अनुभवों से ये बता भी सकते हैं कि किसी भी विषय पर जनमत तैयार करने में सूचना के इन साधनों का अहम योगदान होता है...अब सवाल ये है कि अगर सूचना अपने मूल स्रोत से ही गलत आ रही हो तो आगे क्या होगा...देश में हिंदी में समाचार देखने वाले पैंतीस फ़ीसदी लोग जो महाप्रयोग के दिनों में इन न्यूज़ चैनल्स के जरीए अपना मत बना रहे थे उन्होंने किस तरह का मत बनाया होगा... सवाल ये उठता है कि आखिर एक जिम्मेदार पेशे में होने के बाद भी पत्रकार इस तरह की ख़बरें क्यों दिखा रहे हैं...क्या इन दोनों चैनलों में काम करने वाले पत्रकारों और इन चैनलों के कर्ताधर्ताओं में वैग्यानिक सोच का आभाव है...क्या इन चैनलों को ये लगता है कि टीआरपी सिर्फ लोगों को डरा कर हासिल की जा सकती है... और जो सवाल बार-बार मन में उठता है कि अगर किसी समझदार आदमी से गलती हो जाती है तो वो गलती का अहसास होने पर माफी मांगता है..महाप्रयोग बीच में बंद हो गया...एक नियत समय पर उसे चालू होना था हुआ...इन चैनलों ने कहा कि दुनिया खत्म हो जाएगी..ऐसा हुआ नहीं...ये साबित हो गया है कि आज तक और इंडिया टीवी ये दोनों ही चैनल गलत थे..जाहिर है इसी लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इन चैनलों को नोटिस भी दिया है...तो क्या इन चैनलों का अपने दर्शकों के प्रति नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती की वो अपने दर्शकों से भी माफी मांगे...क्या इन्हें अपने दर्शकों को ये नहीं कहना चाहिए की हमने गलती की और आप हमें क्षमा कर दें...सूचना और प्रसारण मंत्रालय के नोटिस का ये चैनल क्या जवाब देंगे वो तो बाद की बात है...लेकिन दर्शकों को शायद इस बात का इंतज़ार रहे की आखिर ये चैनल कब माफीनामें के साथ उनके सामने रुबरु होंगे
अगर टीआरपी रेटिंग्स के हिसाब से देखे तो समाचार देखने वाले कुल दर्शकों में से लगभग पैंतीस फ़ीसदी लोग इन दो चैनलों को देखते हैं...ये वही दोनों चैनल हैं जो अरसे से लोकप्रियता के मामले में नंबर एक और नंबर दो की कुर्सी पर विराजमान है..पूरी दुनिया जानती थी की जो महाप्रयोग हो रहा है वो साइंसटिफिक है और उससे किसी तरह का नुकसान होने की आशंका बहुत कम है..क्योंकि इस प्रयोग के पीछे साइंसदानों की एक लंबी फौज काम कर रही थी..बेहद जांच परख कर हर कदम उठाया जा रहा था..लेकिन हमारे देश के इन दो चैनलों की उन दिनों की रिपोर्ट्स को मानते तो बस धरती पर जलजला आने वाला था...सब कुछ खत्म होने वाला था.. देश में समाचार देखने वाले दर्शकों को आम तौर पर गंभीर माना जाना जाता...हम सभी जानते हैं कि हमारे देश में सूचना के लिए आम आदमी अख़बार और समाचार चैनलों पर निर्भर करता है...हम सभी अपने सामान्य अनुभवों से ये बता भी सकते हैं कि किसी भी विषय पर जनमत तैयार करने में सूचना के इन साधनों का अहम योगदान होता है...अब सवाल ये है कि अगर सूचना अपने मूल स्रोत से ही गलत आ रही हो तो आगे क्या होगा...देश में हिंदी में समाचार देखने वाले पैंतीस फ़ीसदी लोग जो महाप्रयोग के दिनों में इन न्यूज़ चैनल्स के जरीए अपना मत बना रहे थे उन्होंने किस तरह का मत बनाया होगा... सवाल ये उठता है कि आखिर एक जिम्मेदार पेशे में होने के बाद भी पत्रकार इस तरह की ख़बरें क्यों दिखा रहे हैं...क्या इन दोनों चैनलों में काम करने वाले पत्रकारों और इन चैनलों के कर्ताधर्ताओं में वैग्यानिक सोच का आभाव है...क्या इन चैनलों को ये लगता है कि टीआरपी सिर्फ लोगों को डरा कर हासिल की जा सकती है... और जो सवाल बार-बार मन में उठता है कि अगर किसी समझदार आदमी से गलती हो जाती है तो वो गलती का अहसास होने पर माफी मांगता है..महाप्रयोग बीच में बंद हो गया...एक नियत समय पर उसे चालू होना था हुआ...इन चैनलों ने कहा कि दुनिया खत्म हो जाएगी..ऐसा हुआ नहीं...ये साबित हो गया है कि आज तक और इंडिया टीवी ये दोनों ही चैनल गलत थे..जाहिर है इसी लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इन चैनलों को नोटिस भी दिया है...तो क्या इन चैनलों का अपने दर्शकों के प्रति नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती की वो अपने दर्शकों से भी माफी मांगे...क्या इन्हें अपने दर्शकों को ये नहीं कहना चाहिए की हमने गलती की और आप हमें क्षमा कर दें...सूचना और प्रसारण मंत्रालय के नोटिस का ये चैनल क्या जवाब देंगे वो तो बाद की बात है...लेकिन दर्शकों को शायद इस बात का इंतज़ार रहे की आखिर ये चैनल कब माफीनामें के साथ उनके सामने रुबरु होंगे
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